UP News: मनी लांड्रिंग कानून के तहत अपनों की जांच शुरु करने पर ईडी की चुप्पी
उत्तर प्रदेश के तमाम बड़े घोटालों की जड़ें खंगालने के दौरान एजेंसी के अफसरों का दामन भी होता रहा है दागदार
Sandesh Wahak Digital Desk: अपनों पर करम, गैरों पर सितम…इस कहावत पर केंद्र की वो शीर्ष जांच एजेंसी ईडी सटीक बैठती है। जिसके जिम्मे मनी लांड्रिंग कानून (पीएमएलए) के तहत धनकुबेरों की जांच करना है।

बीते वर्षों में यूपी से जुड़ी कई अहम जांचों के दौरान खुद ईडी के अफसरों पर मैनेज होने सरीखे गंभीर आरोप लगे थे। एजेंसी ने इन अफसरों के खिलाफ कोई कार्रवाई ही नहीं की। सबसे पहला मामला रिटायरमेंट के एक दिन पहले सीबीआई द्वारा घूसखोरी में गिरफ्तार सहायक निदेशक एनबी सिंह का था। एनआरएचएम समेत कई बड़े घोटालों की जांचें इस अफसर के पास थीं। जिसमें खेल से इंकार नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद ईडी ने पीएमएलए के तहत एनबी सिंह के खिलाफ आठ वर्षों में केस दर्ज करके जांच करना मुनासिब नहीं समझा।

करोड़ों के बाइक बोट घोटाले की जांच पड़ी सुस्त
अगला नंबर महाठग संजय शेरपुरिया से जुड़ा है। एसटीएफ को ईडी के दो बड़े अफसरों की संलिप्तता के सुराग शेरपुरिया के मामले में हाथ लगे थे। दोनों अफसरों के ऊपर करोड़ों की जांच खत्म करने के वास्ते लम्बी डीलिंग के संगीन आरोप थे। इनमें से डिप्टी डायरेक्टर रैंक के एक अफसर के ऊपर लखनऊ जोनल दफ्तर में तैनाती के दौरान मनीलांड्रिंग की कई अहम जांचों को मटियामेट करके करोड़ों की काली कमाई करने के आरोप हैं। यह अफसर लम्बे समय तक लखनऊ यूनिट का प्रमुख हिस्सा थे। हालंकि बाद में उनका ट्रांसफर हो गया। ईडी ने इन दोनों अफसरों को सब कुछ जानते हुए मानो अभयदान देकर पूछताछ करना भी गंवारा नहीं समझा। इसी तर्ज पर सैकड़ों करोड़ के बाइक बोट घोटाले की जांच भी मानो गिरवी रख दी गयी थी।

दिल्ली मुख्यालय तक अफसरों की कारस्तानी पता चलने के बाद यह महत्वपूर्ण जांच लखनऊ यूनिट से छीन ली गयी। बाद में नोएडा में ईडी ने छापेमारी के दौरान एक दलाल पकड़ा, जिसने इस जांच के मैनेजमेंट का खुलासा किया। एनआरएचएम से लेकर कई बड़े घोटालों में फंसे रसूखदारों की सम्पत्तियां आज तक जब्त नहीं की गयी। वहीं आयकर विभाग ने जिन मामलों में ईडी को जांच रिपोर्ट भेजी, उसमें भी नतीजा ढाक के तीन पात के बराबर निकला।

नोटिस-नोटिस का खेल : कहां है गोमती की 200 करोड़ की जमीन देने की जांच?
पीएमएलए कानून के तहत बिना केस दर्ज किये अब कई बड़े मामलों में ईडी विभागों और एजेंसियों से भष्टाचार से जुड़ी जानकारियां मांग रही है। लेकिन कई मामलों में जांच शुरू ही नहीं हो पाती या फाइलों में दफन करा दी जाती है। लखनऊ में फर्जीवाड़ा कर बिल्डर राज गंगा डेवलपर्स को गोमती नदी की 200 करोड़ की जमीन देने के मामले में तहसील-एलडीए के कई अफसर ईडी के रडार पर पिछले वर्ष आये थे। ईडी के असिस्टेंट डायरेक्टर जयकुमार ठाकुर ने तहसील व एलडीए से घोटाले से जुड़े दस्तावेज तलब किए। बाद में जांच दफन हो गयी। इस तरह के नोटिसों की जांच हो तो पिछले एक दशक के दौरान तैनात रहे बड़े अफसर चेहरा छुपाते नजर आएंगे।

सीवीसी भी झट देता है क्लीनचिट
दरअसल पूर्व मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति ने अरबों के खनन घोटाले से खूब अवैध सम्पत्तियां खड़ी कीं। प्रजापति के 14 हजार करोड़ के अवैध साम्राज्य की शिकायत करने वाले शिकायतकर्ता ने सीवीसी को पूरा कच्चा चिटठा भेजा। जांच शुरू होते ही मानो खत्म होकर इस डिप्टी डायरेक्टर को क्लीनचिट दे दी गयी। जबकि शिकायत के मुताबिक पूर्व डिप्टी डायरेक्टर के पास करीब दो सौ करोड़ की सम्पत्तियां थीं।
Also Read: इन 7 चीजों पर अब नहीं लगेगा GST, यूपी सरकार ने जारी की शून्य टैक्स वाली वस्तुओं की लिस्ट

