UP News: सरकारी असहयोग से यूपी में सीबीआई की कई अहम जांचें पटरी से उतरी
उत्तर प्रदेश लोकसेवा आयोग की तर्ज पर देश की शीर्ष एजेंसी के निदेशक ने बाकी घोटालों में सुस्ती पर पत्र क्यों नहीं भेजा?
Sandesh Wahak Digital Desk/Manish Srivastava: यूपी में सीबीआई की जांचें पटरी से उतरती नजर आ रही हैं। हाल ही में सीबीआई निदेशक ने यूपी लोकसेवा आयोग (यूपीपीएससी) के भर्ती घोटाले की जांच में असहयोग पर यूपी सरकार को पत्र लिखा था।

जिसमें आयोग के जिम्मेदारों की कार्यप्रणाली का खुलासा था। दर्जन भर से ज्यादा पत्रों के बावजूद न तो जांच के लिए जरूरी दस्तावेज दिये गये और न ही अभियोजन मंजूरी को हरी झंडी दिखायी गयी। निदेशक ने जांच बंद करने की चेतावनी भी इशारों-इशारों में दी। यूपी में सरकारी सहयोग न मिलने पर अहम घोटालों की सीबीआई जांचें वर्षों से अधर में हैं। जांच/अभियोजन मंजूरियां न मिलने पर जांच ही ठप हो रही है।

2017 में सीएम योगी ने यूपीपीएससी घोटाले की जांच सीबीआई को थमाई थी। आठ साल बाद भी यह मुकाम तक नहीं पहुंच सकी है। इसी तरह तकरीबन 50 करोड़ के सचल पालना घोटाले की जांच का जिम्मा हाईकोर्ट ने 2017 में सीबीआई को थमाया। आठ वर्षों में सीबीआई इस घोटाले में खास आगे नहीं बढ़ सकी है। तत्कालीन प्रमुख सचिव श्रम शैलेश कृष्ण और समाज कल्याण बोर्ड की दो बार अध्यक्ष रहीं दिव्या मिश्रा के खिलाफ सीबीआई ने तीन साल पहले सरकार से अभियोजन मंजूरी मांगी थी। दिव्या बसपा नेता सतीश मिश्रा की करीबी रिश्तेदार हैं। बोर्ड के चार कर्मचारियों के खिलाफ भी अभियोजन मंजूरी मांगी गयी थी।

प्रमुख जांचों में एजेंसी को नहीं दी जा रहीं कार्रवाई से जुड़ी जरूरी मंजूरियां
खास बात ये है कि इस घोटाले में लखनऊ के एक भाजपा विधायक भी सुर्खियां बटोर रहे हैं। जिनकी पत्नी बोर्ड में सदस्य थीं। इनके भी एनजीओ बताये जा रहे थे। किसी का बाल बांका आजतक नहीं बिगड़ा। अगला नंबर पावर कारपोरेशन में अरबों के पीएफ घोटाले का है। 2020 में सीबीआई ने जांच शुरू की थी। आईएएस संजय अग्रवाल, आलोक कुमार और अपर्णा यू समेत 12 के खिलाफ 2022 में जांच आगे बढ़ाने की मंजूरी मांगी गयी।

आईएएस के खिलाफ मंजूरी देने से यूपी सरकार ने सीबीआई को साफ मना कर दिया और जांच पटरी से उतर गयी। यही हाल सैकड़ों करोड़ के रिवर फ्रंट घोटाले का है। जिसमें सीबीआई ने दो पूर्व कद्दावर आईएएस के खिलाफ जांच आगे बढ़ाने की मंजूरी सरकार से मांगी। यहां भी नतीजा शून्य निकला। सीएम योगी की सिफारिश पर 2020 में शुरू जांच की रफ्तार भी थम चुकी है। 2019 में शुरू चीनी मिल घोटाले की सीबीआई जांच भी पटरी से लडख़ड़ा चुकी है।

इस घोटाले में सीबीआई ने पूर्व मुख्य सचिव के खिलाफ कार्रवाई की अनुमति मांगी थी। जो सिर्फ फाइलों की शोभा बढ़ा रही है। उक्त रिटायर्ड बड़े आईएएस अफसर तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती के बेहद करीबी और पंचम तल पर तैनात थे। यूपी में बड़े घोटालों की अहम जांचों का हश्र कुछ इसी अंदाज में वर्षों से दिखायी दे रहा है। इससे नौकरशाही का दबाव साफ झलकता है।

जब सीएम योगी ने सीबीआई निदेशक से जताई थी आपत्ति
सीबीआई के एक रिटायर्ड अफसर के मुताबिक निदेशक को बाकी घोटालों की जांचें आगे नहीं बढ़ पाने के मामले में भी यूपी सरकार को पत्र लिखना चाहिए। बड़े-बड़े घोटालों में सिर्फ छोटों को चार्जशीट क्यों किया जाता है। यूपी सरकार ने सीबीआई को कई मामलों की जांचें थमाई हैं। एक बार सीएम योगी आदित्यनाथ से मिलने तत्कालीन सीबीआई निदेशक ऋषि शुक्ला आये थे। उनसे सीएम ने जांचों के वर्षों तक लंबित रहने को लेकर आपत्ति दर्ज कराई थी।
Also Read: सीएम योगी ने सामूहिक विवाह योजना पर कसी लगाम, अब डीएम की मौजूदगी में होगा ये अहम काम

