ASD के इलाज में SCT का इस्तेमाल गलत: सुप्रीम कोर्ट
Sandesh Wahak Digital Desk: ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) के इलाज में स्टेम सेल ट्रीटमेंट (SCT) थेरेपी के इस्तेमाल को सुप्रीम कोर्ट ने गलत ठहराया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ASD के इलाज के तौर पर SCT देना सही नहीं है क्योंकि इसके पीछे वैज्ञानिक सपोर्ट की कमी है। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने कहा कि SCT को केवल निगरानी वाले क्लिनिकल रिसर्च ट्रायल के लिए ही मंज़ूरी दी जा सकती है और इसे अनुभवजन्य सबूतों द्वारा समर्थित सही मेडिकल प्रैक्टिस के रूप में मान्यता नहीं मिली है। कोर्ट ने यह भी कहा कि ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट के तहत इसे ड्रग मान लेना नियमित इलाज वैध नहीं ठहराता और ऐसा करने पर मेडिकल लापरवाही मानी जाएगी।
मरीजों और माता-पिता के लिए चेतावनी
बेंच ने माता-पिता और मरीजों को चेताया कि कोई अप्रमाणित तरीका अपनाने से बचें। जिन मरीजों ने पहले से SCT थेरेपी ली है, उनके लिए कोर्ट ने कहा कि इसे नियमित क्लिनिकल इलाज के रूप में कमर्शियल प्रयास के तौर पर जारी नहीं रखा जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मरीजों को ऐसे इलाज का अधिकार अपने नाम पर नहीं मिलता और यदि इलाज पर्याप्त जानकारी के बिना कराया गया तो यह मेडिकल नैतिकता का उल्लंघन है।
सरकार को निर्देश और समयसीमा
कोर्ट ने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि वह अपने कानूनी रुख को मजबूत करे और स्पष्ट दिशा निर्देश जारी करे ताकि इसे बेहतर ढंग से लागू किया जा सके। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को AIIMS और नेशनल मेडिकल काउंसिल के अधिकारियों के साथ मिलकर इस संबंध में सबसे अच्छा संभव समाधान प्रदान करने का निर्देश दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने चार सप्ताह का समय देते हुए कहा कि इसके दौरान मरीज तब तक थेरेपी ले सकते हैं जब तक उन्हें उन संस्थानों में ट्रांसफर नहीं किया जा सकता जो क्लिनिकल ट्रायल कर रहे हैं।
जानकारी और सहमति के महत्व पर जोर
कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी खास इलाज के बारे में पर्याप्त जानकारी के बिना सहमति वैध नहीं मानी जाएगी। मेडिकल नैतिकता का पालन करते हुए मरीजों को केवल तभी इलाज दिया जा सकता है जब उन्हें पर्याप्त जानकारी और विकल्प उपलब्ध हों। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मरीजों द्वारा स्वेच्छा से चुनी गई प्रक्रिया भी तब वैध नहीं मानी जाएगी जब पर्याप्त इलाज और जानकारी मौजूद न हो।

