Varanasi News: जातिगत पहचान का प्रदर्शन बर्दाश्त नहीं, पुलिस कमिश्नर ने चलाया विशेष अभियान

Sandesh Wahak Digital Desk: अगर आप भी अपने वाहन पर ‘ठाकुर’, ‘ब्राह्मण’, ‘यादव’ जैसी जातियों के नाम लिखवा कर सड़कों पर रौब दिखा रहे हैं, तो अब सावधान हो जाइए।

वाराणसी पुलिस कमिश्नरेट ने इस पर सख्त रुख अख्तियार कर लिया है। न्यायालय के आदेशों का पालन करवाने के लिए पुलिस कमिश्नर मोहित अग्रवाल स्वयं सड़क पर उतरे और निरीक्षण के दौरान दर्जनों वाहनों से जातिसूचक शब्द हटवाए।

कमिश्नर ने स्पष्ट किया कि अब सार्वजनिक स्थानों और वाहनों पर जातिसूचक शब्दों का प्रदर्शन पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा। इसका उल्लंघन करने वालों के खिलाफ मोटर वाहन अधिनियम के तहत कार्रवाई की जाएगी।

12 वाहनों से हटवाए गए जातिसूचक बोर्ड, कटे चालान

निरीक्षण के दौरान पुलिस कमिश्नर ने जातिगत पहचान दर्शाते बोर्ड/स्टिकर लगे 12 वाहनों से तत्काल वह स्टीकर हटवाए और संबंधित वाहन स्वामियों का चालान कराया।

उन्होंने चेतावनी दी कि भविष्य में ऐसी गतिविधियों को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

जातिगत रैलियों पर भी रहेगा प्रतिबंध

कमिश्नर ने यह भी कहा कि अब जाति आधारित रैलियों पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा। ऐसे आयोजनों से समाज में वैमनस्य और तनाव की स्थिति उत्पन्न होती है, जिसे रोकना आवश्यक है।

FIR और पुलिस रिकॉर्ड से भी हटेगा जाति का उल्लेख

एक बड़ा प्रशासनिक बदलाव करते हुए कमिश्नर ने निर्देश दिया कि अब से पुलिस द्वारा दर्ज की जाने वाली एफआईआर, बरामदगी पंचनामा, गिरफ्तारी मेमो, तलाशी मेमो और थानों के नोटिस बोर्ड पर अभियुक्तों की जाति का कोई उल्लेख नहीं किया जाएगा।

इस फैसले को सामाजिक समरसता और समानता की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है। पुलिस कमिश्नर के अनुसार, “जातिगत पहचान का प्रदर्शन न केवल असंवैधानिक है, बल्कि इससे सामाजिक विभाजन को भी बढ़ावा मिलता है।”

सख्ती के पीछे क्या है कारण?

सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट द्वारा समय-समय पर जारी निर्देशों के तहत जातिसूचक शब्दों के सार्वजनिक प्रदर्शन पर रोक है।

बावजूद इसके, कई वाहन मालिक अपनी जाति दर्शाते स्टीकर लगाकर नियमों का उल्लंघन कर रहे थे। अब पुलिस ने इस पर सख्ती दिखानी शुरू कर दी है।

संदेश साफ है: कानून सबके लिए समान

पुलिस की इस कार्रवाई से स्पष्ट संदेश गया है कि समाज में समानता, भाईचारा और संविधान के मूल्यों को प्राथमिकता दी जाएगी। जातिगत पहचान के प्रदर्शन को न बढ़ावा मिलेगा, न सहमति।

रिपोर्ट- मदन मुरारी पाठक

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