Milkipur By Election: साइलेंट वोटर ‘काम’ कर गया, ‘गोहराते’ रहे ‘दल-दल’ वाले

Sandesh Wahak Digital Desk/ Prem Kishore Tiwari: उत्तर प्रदेश की मिल्कीपुर विधानसभा सीट ऐसी है, जहां सबसे इतर हुए उपचुनाव में मतदाताओं ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। मतदान का प्रतिशत प्रथम श्रेणी के अंक तक पहुंच गया। उपचुनाव का मजेदार तथ्य यह रहा कि आम मतदाता ने चाहे सपा हो या भाजपा या कोई और दल वाले, इनकी गुहार-मनुहार सुनी-अनसुनी कर दलों के दलदल में फंसे बिना ‘मन की इबारत’ ईवीएम में दर्ज कर दी।

यह तो अयोध्या के राम ही जानें कि राजनीतिक दलों की गुहार खुद को हार के दलदल से निकालने की थी या आम मतदाताओं को दलदल में फंसाकर खुद निबुक जाने की। बहरहाल, यह था साइलेंट वोटर, जिस पर सिर्फ मतदाता होने का ठप्पा था। माना जा रहा है कि यही वह मतदाता है जो किसी की जीत में निर्णायक भूमिका निभाएंगे। हालांकि, जातीय गणित और उनके मनोभावों को दरकिनार कर उपचुनाव पर समग्र दृष्टि नहीं डाली जा सकती है। जातीय आंकड़े भी उपचुनाव के परिणाम को प्रभावित करने वाला बड़ा फैक्टर है।

अपने-पराए के तराजू में जो तौले न जा सके वही बनाएंगे विधायक

अपने-पराये के तराजू में जो मतदाता तौले न जा सके, वही मिल्कीपुर से किसी एक प्रत्याशी को विधानसभा पहुंचाएंगे। मतदान के दिन तक भ्रम की स्थिति में न केवल राजनीतिक दल रहे, बल्कि प्रशासन भी रहा। सिर्फ अनुमान ही था कि शायद अमुक मतदाता का मत हमें ही मिलने वाला है। यह स्थिति तकरीबन हर चुनाव में होती है, लेकिन जब पुलिस-प्रशासन सामने हो तो आम मतदाता शांत मुद्रा में अपना मत डाल जाता है।

BJP And SP

जातीय आंकड़ों के आधार पर सपा व भाजपा मतदान के बाद जीत-हार का गणित जरूर लगा रही है, लेकिन यह सिर्फ अनुमान और अंधे विश्वास पर निर्भर माना जाएगा। सपा की मानें तो उन मतदाताओं को अधिक मशक्कत करनी पड़ी जिन पर सत्ता विरोधी होने का ठप्पा लगा था। इस सब के बीच कहीं ऐसे मतदाता को सफलता मिली तो कहीं बैरंग लौटने की नौबत भी आई।

कारण मतदाता सूची से नाम गायब होना रहा हो या फिर दूसरी परेशानियां। भाजपा मतदान के दिन ऐसे शांत भाव में थी, जैसे नतीजे उन्हें पहले से मालूम हों। हालांकि उत्साह से लवरेज भगवाधारी भी सपाइयों से कम नहीं थे। भगवा व लाल रंग का बोलबाला सबने देखा-सुना, लेकिन ‘रंग’ तो किसी एक का ही मिल्कीपुर के अधिसंख्य मतदाताओं को पसंद आया होगा। बहरहाल, मतदान का प्रतिशत बेहतर होने से कयासों की गुंजायश कम हुई है। माना यही जा रहा है कि नतीजे चौंकाने वाले हो सकते हैं।

 

निर्णायक भूमिका में नजर आया गैरपासी दलित वोटर्स

जातीय समीकरण पर गौर करें तो पासी समाज का 60 हजार वोट तीन जगहों पर बंटता नजर आया। कारण बहुत साफ है कि सपा के अजीत प्रसाद, भाजपा के चंद्रभानु व आजाद समाज पार्टी के सूरज चौधरी तीनों ही पासी बिरादरी के हैं। अब बचा करीब 60 हजार गैरपासी दलित, जो चुनाव में निर्णायक भूमिका में नजर आया। अयोध्या में दलित बेटी की निर्मम हत्या पर सपा सांसद के आंसू और तेवर को भाजपा भले घडिय़ाली व दिखावटी बता रही हो, लेकिन कहीं न कहीं कम पढ़े-लिखे मतदाताओं पर असर डाल सकती है।

हालांकि इन्हीं के बीच की महिला प्रत्याशी भी निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में ताल ठोंक रही हैं, लेकिन उन्हें व्यक्तिगत मतों के अलावा कुछ हासिल होता नजर नहीं आ रहा है। विधानसभा क्षेत्र में ब्राह्मण मतदाता करीब 60 हजार के ही करीब हैं। यह वर्ग सनातनी होने के साथ बुद्धिजीवी होने का दम भरता है। यहां महाकुंभ हादसे की चर्चा यह संकेत दे रही थी कि ब्राह्मण बंट सकता है। हालांकि सपा नेता व पूर्व मंत्री पवन पांडेय कितना ब्राह्मणों को एकजुट कर सके यह तो मतगणना के वक्त ही पता चलेगा। या फिर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का सनातन धर्म का नारा सपा की साइकिल से तेज दौड़ेगा।

पुलिस-प्रशासन की भूमिका पर उठते रहे सवाल

यादव और मुस्लिम मतदाताओं को जोड़ दें तो संख्या 90 हजार के करीब पहुंच जाएगी। इन पर सपा का ठप्पा ठीक उसी तरह लगा जिस तरह क्षत्रिय वोटर पर भाजपा का। सपा यादव व मुस्लिमों को मतदान से रोकने का संदेह जताकर पुलिस-प्रशासन को आरोपित करती आ रही है। मतदान के दिन सपा ने मतदान कार्मिकों की निष्पक्षता पर भी आरोप लगाया है। चुनाव में सरेआम पुलिस का वह रूप नजर नहीं आया जिसकी चर्चा चल रही थी, लेकिन विरोधियों के वर्चस्व वाले क्षेत्रों में बेजा सख्ती का आरोप भी सपा ने लगाया है।

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