क्या होती है सुप्रीम कोर्ट की AOR परीक्षा, पास करने के बाद मिलती हैं खास जिम्मेदारियां

Sandesh Wahak Digital Desk: सुप्रीम कोर्ट में हजारों वकील प्रैक्टिस करते हैं, लेकिन उनमें से करीब 3500 वकीलों की एक अलग पहचान होती है। ये वे वकील होते हैं जिन्हें सुप्रीम कोर्ट में सीधे याचिका दाखिल करने का अधिकार होता है। ऐसे वकीलों को एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड यानी AOR कहा जाता है। AOR बनने के लिए वकीलों को एक विशेष और कठिन परीक्षा पास करनी होती है, जिसे AOR परीक्षा कहा जाता है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की यह परीक्षा आयोजित की गई, जिसमें हजारों वकीलों ने हिस्सा लिया।

कब शुरू हुई AOR प्रणाली?

AOR परीक्षा की शुरुआत सुप्रीम कोर्ट के 1966 के नियमों के तहत हुई थी। इन नियमों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट में वकालतनामा दाखिल करने और याचिका प्रस्तुत करने का अधिकार केवल एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड को दिया गया। इससे पहले अदालत में “एजेंट” की एक पुरानी व्यवस्था लागू थी, जिसे खत्म करके AOR प्रणाली लागू की गई।

नियमों में संशोधन करते हुए यह तय किया गया कि AOR बनने के लिए परीक्षा पास करना अनिवार्य होगा। तभी से सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड बनने के लिए नियमित रूप से AOR परीक्षा आयोजित की जाती है।

AOR परीक्षा के चार महत्वपूर्ण पेपर

AOR परीक्षा में आमतौर पर चार अलग-अलग पेपर होते हैं, जिनके माध्यम से वकीलों की कानूनी समझ और प्रक्रिया संबंधी जानकारी का परीक्षण किया जाता है। इन पेपरों में सुप्रीम कोर्ट की प्रैक्टिस और प्रक्रिया, ड्राफ्टिंग, प्रोफेशनल एथिक्स और लीडिंग केसेज से जुड़े विषय शामिल होते हैं।

इन सभी विषयों के जरिए यह सुनिश्चित किया जाता है कि जो वकील AOR बनें, उन्हें सुप्रीम कोर्ट की कार्यप्रणाली और कानूनी प्रक्रियाओं की गहरी जानकारी हो।

पूरी करनी होती हैं खास शर्तें

AOR परीक्षा देने के लिए वकीलों को कुछ जरूरी शर्तों को पूरा करना होता है। सबसे पहले किसी भी वकील का नाम कम से कम चार साल तक किसी राज्य बार काउंसिल में दर्ज होना चाहिए। इसके बाद उसे कम से कम दस साल के अनुभव वाले किसी एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड के साथ एक साल तक ट्रेनिंग करनी होती है।

यह ट्रेनिंग पूरी करने के बाद ही वकील को AOR परीक्षा में बैठने की अनुमति मिलती है। परीक्षा पास करने के लिए हर पेपर में कम से कम 50 प्रतिशत अंक हासिल करना जरूरी होता है और कुल मिलाकर 60 प्रतिशत अंक प्राप्त करना अनिवार्य होता है। इसी वजह से इस परीक्षा को काफी कठिन माना जाता है और कई वर्षों में इसका पास प्रतिशत लगभग 20 से 30 प्रतिशत के आसपास ही रहता है।

लागू करने के पीछे SC का उद्देश्य

सुप्रीम कोर्ट ने AOR प्रणाली इसलिए लागू की ताकि अदालत में दाखिल होने वाली याचिकाओं और फाइलिंग की प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित और जिम्मेदारी के साथ पूरी हो सके। पहले कोई भी वकील सीधे सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर सकता था, जिससे कई बार तकनीकी गलतियां हो जाती थीं।

AOR प्रणाली लागू होने के बाद यह सुनिश्चित किया गया कि एक निश्चित वकील फाइलिंग की पूरी प्रक्रिया के लिए जिम्मेदार होगा और याचिका सभी नियमों के अनुसार ही दाखिल की जाएगी।

केस फाइल करने का अधिकार केवल AOR को

सुप्रीम कोर्ट की प्रक्रिया काफी तकनीकी और सख्त मानी जाती है। यहां नियमों, लिमिटेशन, एनेक्सर्स और हलफनामों से जुड़ी कई औपचारिकताएं होती हैं। AOR बनने वाले वकीलों को इन सभी प्रक्रियाओं की विशेष ट्रेनिंग दी जाती है और परीक्षा के माध्यम से उनकी जानकारी की जांच की जाती है।

सुप्रीम कोर्ट में केस फाइल करने का अधिकार केवल एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड के पास होता है। अन्य वकील अदालत में बहस कर सकते हैं, लेकिन किसी मामले की फाइलिंग और औपचारिक प्रतिनिधित्व AOR के माध्यम से ही किया जाता है।

तीन जजों की कमेटी करती है निगरानी

AOR प्रणाली और परीक्षा से जुड़ी पूरी प्रक्रिया की निगरानी सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की एक कमेटी करती है। वर्तमान में इस कमेटी में जस्टिस जे.के. माहेश्वरी, जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन शामिल हैं।

इसके अलावा परीक्षा की तैयारी के लिए सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन की ओर से अभ्यर्थियों के लिए वरिष्ठ वकीलों के लेक्चर भी आयोजित किए जाते हैं, ताकि वकीलों को परीक्षा और सुप्रीम कोर्ट की प्रक्रिया की बेहतर समझ मिल सके।

 

Also Read: योगी कैबिनेट में हुए 30 बड़े फैसले: अब बिना खतौनी जांचे नहीं होगी रजिस्ट्री, कर्मचारियों के लिए बदले नियम

Get real time updates directly on you device, subscribe now.