क्या आजम खान की रिहाई से बदलेगी यूपी की सियासत? अखिलेश यादव से रिश्तों पर उठ रहे सवाल
Sandesh Wahak Digital Desk: समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव आजम खान 23 महीने बाद जमानत पर सीतापुर जेल से बाहर आने वाले हैं। मुस्लिम सियासत का एक बड़ा चेहरा माने जाने वाले आजम खान की रिहाई से रामपुर ही नहीं, बल्कि पूरी उत्तर प्रदेश की सियासत में हलचल बढ़ गई है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या उनकी और सपा प्रमुख अखिलेश यादव के बीच की सियासी केमिस्ट्री बनी रहेगी?
जेल में रहते हुए भी दिखाई थी नाराजगी
2017 में बीजेपी की सरकार आने के बाद आजम खान पर 90 से ज़्यादा मुकदमे दर्ज हुए थे, जिनमें से ज़्यादातर जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े थे। अक्टूबर 2023 में उन्हें अपने बेटे अब्दुल्ला आजम के दो जन्म प्रमाणपत्रों के मामले में सजा हुई थी, जिसके बाद उन्हें सीतापुर जेल में डाल दिया गया था।
जेल में रहने के दौरान, आजम खान ने अपने समर्थकों के जरिए यह साफ कर दिया था कि वे अखिलेश यादव से नाराज हैं। इस दौरान अखिलेश यादव उनसे मिलने सिर्फ एक-दो बार ही गए थे, और पार्टी ने उनकी रिहाई के लिए कोई बड़ा आंदोलन भी नहीं चलाया। उनकी नाराजगी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जेल में उनसे मिलने के लिए शिवपाल यादव और चंद्रशेखर आजाद जैसे नेता पहुंचे, लेकिन उन्होंने सपा नेताओं से दूरी बनाए रखी।
रामपुर में क्या होगा असर?
आजम खान के जेल जाने से रामपुर की सियासत पूरी तरह बदल गई है। उनकी गैरमौजूदगी में रामपुर में सपा का गढ़ कमजोर हुआ है। हालाँकि, लोकसभा चुनाव में सपा ने यहाँ जीत दर्ज की, लेकिन सांसद मोहिबुल्लाह नदवी को आजम खान के विरोधी खेमे का माना जाता है। अब आजम खान की वापसी से उनके समर्थक फिर से सक्रिय हो जाएंगे और रामपुर में सांसद मोहिबुल्लाह नदवी का प्रभाव कम हो सकता है।
क्या आजम खान छोड़ेंगे सपा का दामन?
आजम खान की रिहाई के बाद सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं कि क्या वह सपा से अलग हो जाएंगे। कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आजम खान सपा से नाराज तो हैं, लेकिन वे पार्टी का साथ नहीं छोड़ेंगे। उन्हें ‘प्रेशर पॉलिटिक्स’ का माहिर खिलाड़ी माना जाता है। पहले भी जब वह 27 महीने बाद जेल से बाहर आए थे, तब भी उनकी नाराजगी की खबरें थीं, लेकिन अखिलेश यादव ने उन्हें मना लिया था।
दूसरी ओर, नगीना से लोकसभा सांसद बने चंद्रशेखर आजाद ने भी जेल में आजम खान से कई बार मुलाकात की थी। चंद्रशेखर दलित-मुस्लिम समीकरण के सहारे यूपी में अपनी जगह बनाना चाहते हैं। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि आजम खान की वापसी के बाद यूपी की राजनीति क्या नया मोड़ लेती है।
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