60 सेकेंड की दुनिया : ध्यान भटकाती रील्स और लुप्त होता धैर्य
एक समय था जब लोग अख़बार के सम्पादकीय पढ़ने में सुबह की चाय का आनंद लेते थे, उपन्यासों में डूबकर समय भूल जाया करते थे और किसी विषय पर मनन करना एक सहज आदत थी। लेकिन आज, जब 60 सेकंड की रील्स, लघु वीडियो और क्लिप्स की भरमार है, तो लगता है जैसे हमारा धैर्य और ध्यान दोनों सिमटते जा रहे हैं।
सोशल मीडिया और डिजिटल मंचों ने जिस तेज़ गति वाले, दृश्यात्मक और छोटे वीडियो सामग्री को बढ़ावा दिया है, वह केवल मनोरंजन का साधन नहीं रह गया है, बल्कि अब यह हमारी सोचने, समझने और सीखने की प्रक्रिया को भी प्रभावित कर रहा है। किसी विषय को गहराई से समझने की बजाय अ हमें केवल झलक चाहिए – वो भी तेज़, रंगीन और रोमांचक।

ध्यान की अवधि में आई गिरावट: क्या कहती हैं शोध रिपोर्टें ?
- एक प्रसिद्ध अध्ययन (माइक्रोसॉफ्ट कनाडा रिपोर्ट, 2015) के अनुसार, वर्ष 2000 में जहाँ इंसान का औसत ध्यानकाल 12 सेकेंड था, वहीं 2015 में यह घटकर 8 सेकेंड रह गया है। यानी एक सुनहरी मछली से भी कम है।
- डिजिटल न्यूरोसाइंस के कई शोधों में बताया गया है कि तेज़ी से स्क्रॉल होने वाली सामग्री मस्तिष्क को डोपामीन के ‘इनाम चक्र’ में फंसा देती है, जिससे व्यक्ति को हर पल कुछ नया और उत्तेजक चाहिए होता है – और इससे गहराई से सोचने की क्षमता कमजोर होती जाती है।
- कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, इरविन की प्रोफेसर ग्लोरिया मार्क के अनुसार, जो व्यक्ति सोशल मीडिया या शॉर्ट वीडियो पर अधिक समय बिताता है, वह औसतन हर 47 सेकेंड में अपना ध्यान भटकाता है।

सबसे ज़्यादा असर युवा वर्ग पर
विशेष रूप से युवा पीढ़ी, जो अब डिजिटल युग में ही बड़ी हो रही है, उसे अब लंबे लेख या किताबों में चना कठिन लगने लगा है। उनकी प्राथमिकता अब कहानियों के बजाय छोटे वीडियो क्लिप्स देखने की हो गई है। ध्यान केंद्रित कर पाना एक चुनौती बन गया है। शिक्षक और माता-पिता दोनों इस बात से चिंतित हैं कि बच्चों का ध्यान अब ज़्यादा देर तक एक जगह नहीं टिकता।
यह आदत केवल युवाओं तक सीमित नहीं रही। अब बड़े और बुजुर्ग भी रील्स और शॉर्ट वीडियो देखने के आदी हो चुके हैं। हर उम्र के लोग मोबाइल स्क्रीन पर लगातार तेज़ और नई सामग्री तलाशते रहते हैं। लगातार स्क्रॉल करने की यह आदत अब एक सामान्य व्यवहार बन चुकी है।
परिणाम क्या हो रहा है?
• पढ़ने की आदत में भारी गिरावट
• लंबे समय तक ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कमजोर
• भावनात्मक गहराई में कमी
• निरंतरता और अनुशासन की गिरावट
• डिजिटल थकान और चिंता में वृद्धि

समाधान: रील्स को त्यागें नहीं, संतुलन बनाएँ
इन शॉर्ट वीडियो को पूरी तरह नकारना व्यावहारिक नहीं होगा, लेकिन उनका संतुलित उपयोग और डिजिटल अनुशासन बेहद ज़रूरी है:
- अभिभावकों और शिक्षकों को चाहिए कि वे बच्चों को रचनात्मक पढ़ाई, लंबी कहानियाँ, चर्चा और संवाद में लगाएँ।
- सरकार और शैक्षणिक संस्थानों को डिजिटल भलाई, ध्यान केंद्रित करने की तकनीकें, और मस्तिष्क को आराम देने की आदतें सिखाने की पहल करनी चाहिए।
- व्यक्तिगत स्तर पर हमें भी अपनी स्क्रीन पर बिताए समय की आदतों का विश्लेषण करना चाहिए – क्योंकि जो समय हम आंखें गड़ाए स्क्रॉलिंग में बिताते हैं, वही समय हमारे जीवन की असली गुणवत्ता तय करता है।
निष्कर्ष:
अगर हम हर बात को केवल 60 सेकें में समझना चाहेंगे, तो हम केवल सतह को छुएंगे, गहराई कभी नहीं पाएंगे। रील्स और शॉर्ट वीडियो मनोरंजन का ज़रिया ज़रूर हैं, लेकिन जब इन पर अत्यधिक निर्भरता हो जाती है, तो यह हमारे ध्यान, पढ़ने की आदत और भावनात्मक समझ को प्रभावित करने लगती है।
अब ज़रूरत है संतुलन बनाने की — जहाँ तकनीक का उपयोग हो, लेकिन सोचने और महसूस करने की क्षमता भी बनी रहे।
रिपोर्ट : आफरीन बानो

