ऐसी तेज़ रफ्तार जो बचा सकती है आपकी जान, समझिए क्या है FAST का मतलब
Sandesh Wahak Digital Desk: तेज़ रफ्तार जान ले भी सकती है और जान बचा भी सकती है। यह बात सड़क हादसों की नहीं, बल्कि ब्रेन स्ट्रोक की है। क्योंकि स्ट्रोक के मामले में स्पीड यानी “FAST” ही किसी की ज़िंदगी बचाने की कुंजी है। अगर आपने इस शब्द को याद कर लिया, तो हो सकता है किसी की ज़िंदगी आपके समय पर लिए गए एक फ़ैसले से बच जाए। “FAST” यानी, F for Face, अगर किसी व्यक्ति के चेहरे का एक हिस्सा लटकने लगे, A for Arm, अगर हाथ सुन्न पड़ जाए, S for Speech, अगर बोलने में लड़खड़ाहट आए, तो T for Time, यानी वक्त बर्बाद न करें, तुरंत अस्पताल पहुंचें। ये सारे संकेत ब्रेन स्ट्रोक के हैं, और शुरुआती साढ़े चार घंटे (Golden Hours) के भीतर इलाज मिलने पर मरीज की जान बच सकती है।
प्रदूषण और ब्रेन स्ट्रोक का रिश्ता
हाल ही में आई रिसर्च बताती है कि प्रदूषण सिर्फ फेफड़ों ही नहीं, दिमाग के लिए भी खतरनाक होता है। ट्रैफिक स्मॉग में सिर्फ दो घंटे बिताने से ही मस्तिष्क की गतिविधियों पर असर पड़ता है। ठंड के मौसम में तो स्ट्रोक के मामले 25% तक बढ़ जाते हैं। दिल्ली की बात करें तो करीब ढाई करोड़ की आबादी में हर साल 30 हजार से ज़्यादा स्ट्रोक के केस दर्ज होते हैं, और हर तीन में से एक मरीज की मौत हो जाती है। इसका कारण है, बढ़ता पॉल्यूशन, बिगड़ती लाइफस्टाइल और लापरवाही।
ब्रेन स्ट्रोक के लक्षण
अचानक सिरदर्द, चक्कर, देखने में धुंधलापन, चेहरा टेढ़ा होना या शरीर का एक हिस्सा सुन्न पड़ जाना, ये सभी लक्षण ब्रेन स्ट्रोक की ओर इशारा करते हैं।
दरअसल ब्रेन स्ट्रोक दो प्रकार का होता है, पहला इस्कीमिक स्ट्रोक, जिसमें ब्लड क्लॉटिंग के कारण मस्तिष्क में खून का प्रवाह रुक जाता है (85% केस इसी वजह से होते हैं)। वहीं दूसरा हेमरेजिक स्ट्रोक, जिसमें दिमाग की नस फटने से ब्लीडिंग शुरू हो जाती है (लगभग 15% मामले)।
रोकथाम के तरीके
दरअसल जिन्हें हाई ब्लड प्रेशर की समस्या है, उन्हें स्ट्रोक का खतरा चार गुना अधिक रहता है। स्मोकिंग करने वालों में यह खतरा दोगुना बढ़ जाता है। डायबिटीज़, मोटापा और तनाव से ग्रस्त लोग भी इसकी चपेट में जल्दी आते हैं।
करीब 80% ब्रेन स्ट्रोक के मामले थोड़ी सावधानी से रोके जा सकते हैं। इसके लिए ब्लड प्रेशर कंट्रोल में रखें, संतुलित आहार लें, रोजाना योग या एक्सरसाइज़ करें, धूम्रपान और शराब से दूरी बनाएं, ब्लड शुगर लेवल सामान्य रखें और सबसे ज़रूरी- तनाव से खुद को बचाएं।
प्रदूषण का दिमाग और शरीर पर असर
दरअसल स्मॉग और धुएं से गले में खराश, आंखों में जलन, कंजक्टिवाइटिस, सूखी खांसी, सीने में जलन और स्किन एलर्जी जैसी दिक्कतें आम हो जाती हैं। इससे बचने के लिए बुजुर्गों, बच्चों और बीमार लोगों को बाहर निकलने से बचना चाहिए। जरूरी हो तो मास्क पहनें, घर में एयर प्यूरीफायर या पौधों का इस्तेमाल करें, और ठंडी-खट्टी चीज़ों से दूरी बनाए रखें।
खानपान से भी मिलेगी राहत
क्रैनबेरी- इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट स्किन एलर्जी रोकते हैं और इम्यूनिटी बढ़ाते हैं।
अखरोट- फेफड़ों के लिए वरदान है, यह सीने की जकड़न कम करता है और मानसिक थकान घटाता है।
गुड़- खून में ऑक्सीजन लेवल बढ़ाता है और प्रदूषण का असर कम करता है।
नींबू- शरीर को हाइड्रेटेड रखता है और टॉक्सिन्स बाहर निकालने में मदद करता है।
सर्दी और प्रदूषण के इस मौसम में “FAST” को याद रखना उतना ही ज़रूरी है जितना सांस लेना। चेहरे का लटकना, हाथ सुन्न पड़ना या बोलने में लड़खड़ाहट- इनमें से कोई भी लक्षण नज़र आते ही तुरंत अस्पताल पहुंचें। क्योंकि समय ही जीवन है और स्ट्रोक के मामले में हर सेकंड कीमती होता है।
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