आत्मनिर्भरता का मतलब सिर्फ हथियार बनाना नहीं, थल सेनाध्यक्ष ने बताया भविष्य के युद्धों का नया मंत्र
Sandesh Wahak Digital Desk: रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत का दायरा केवल स्वदेशी हथियार और सैन्य उपकरण तैयार करने तक सीमित नहीं है। असली क्षमता यह है कि भारत किसी भी लंबे समय तक चलने वाले युद्ध में अपनी सैन्य ताकत और आपूर्ति को निर्बाध रूप से बनाए रख सके। रविवार को बदलते युद्ध के दौर में आत्मनिर्भरता विषय पर बोलते हुए थल सेनाध्यक्ष जनरल धीरज सेठ ने भारतीय रक्षा रणनीति और भावी चुनौतियों पर कई अहम विचार साझा किए।
1971 के युद्ध से अलग हैं आज के रुक-रुक कर होने वाले युद्ध
आधुनिक युद्धों के बदलते मिजाज का विश्लेषण करते हुए सेनाध्यक्ष ने 1971 के ऐतिहासिक ढाका आत्मसमर्पण का स्मरण कराया। उन्होंने कहा कि पिछली सदी की जंगों का एक स्पष्ट अंत होता था, जैसा 1971 में देखा गया। लेकिन आज के दौर में युद्धों की कोई निश्चित समय-सीमा या स्पष्ट अंत नहीं होता। तकनीक लड़ाइयों की तीव्रता तो बढ़ा सकती है, लेकिन युद्ध को खत्म करने की गारंटी नहीं देती। आज का दौर रुक-रुक कर होने वाले युद्धों का है, जहाँ लंबे संघर्ष के बीच-बीच में भीषण लड़ाइयाँ छिड़ती रहती हैं।
सस्ते ड्रोन बने महंगे हथियारों के लिए खतरा
जनरल सेठ ने कहा कि सैन्य उपकरण विकसित करने में सालों का वक्त लगता है, जबकि तकनीक बहुत तेजी से पुरानी हो जाती है। ऐसे में चुनौती सिर्फ स्वदेशी हथियार बनाने की नहीं, बल्कि उन्हें सेवा में शामिल किए जाने तक प्रासंगिक बनाए रखने की है। उन्होंने सचेत किया कि आज महज कुछ सौ डॉलर का एक साधारण ड्रोन लाखों डॉलर की कीमत वाले भारी सैन्य प्लेटफार्म को तबाह कर सकता है। इसलिए भारत की विविधतापूर्ण भौगोलिक स्थितियों सियाचिन की बर्फीली चोटियों से लेकर थार के तपते रेगिस्तान के अनुकूल स्मार्ट और सस्ती तकनीक विकसित करना अनिवार्य है।
सेनाध्यक्ष ने पुरानी सैन्य प्रणालियों को पूरी तरह से खारिज करने की सोच का विरोध किया। उन्होंने उदाहरण देते हुए समझाया कि दशकों पुरानी एयर डिफेंस तोपों में यदि आधुनिक सेंसर और फायर कंट्रोल सिस्टम लगा दिए जाएँ, तो वे दुश्मन के ड्रोन और ड्रोन स्वार्म्स का काल बन सकती हैं। भविष्य की सैन्य क्षमता का अर्थ पुरानी प्रणालियों को फेंकना नहीं, बल्कि पुरानी और भरोसेमंद तकनीकों को नई डिजिटल क्षमता के साथ जोड़कर मारक बनाना है।
जमीन पर नियंत्रण ही जीत का असली मापदंड
सूचना, साइबर और अंतरिक्ष युद्ध के नए मोर्चों का स्वागत करते हुए भी थल सेनाध्यक्ष ने थल सेना की बुनियादी भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि लंबी दूरी की मिसाइलें युद्ध का रुख मोड़ सकती हैं, लेकिन ज़मीन पर कब्ज़ा करने, उसकी रक्षा करने और जीत तय करने का काम अंततः सैनिक ही करता है। इसलिए आत्मनिर्भरता और सैन्य विकास के हर निर्णय के केंद्र में योद्धा होना चाहिए।
भारतीय रक्षा क्षेत्र की उपलब्धियों का ब्योरा देते हुए जनरल सेठ ने बताया कि आज देश का रक्षा उत्पादन 80 से अधिक देशों तक पहुँच रहा है। सेना के उपयोग में आने वाले 175 में से 159 प्रकार के गोला-बारूद का पूरी तरह स्वदेशीकरण किया जा चुका है। इसमें लगभग 16,000 सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग योगदान दे रहे हैं। उन्होंने अपनी बात का समापन करते हुए कहा कि आत्मनिर्भरता हमें लड़ने की स्वतंत्रता देती है, क्षमता सामर्थ्य प्रदान करती है और योद्धा जीतने की इच्छाशक्ति देता है।
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