मोदी सरकार का 5 साल में 1 करोड़ इंटर्नशिप का वादा, 2 साल में सिर्फ 30 हजार को ही मिला लाभ

PM Internship Scheme: केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना (PMIS) को शुरू हुए दो साल हो चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 3 अक्टूबर 2024 को इसकी शुरुआत की थी। सरकार ने पांच साल में एक करोड़ युवाओं को इंटर्नशिप देने का लक्ष्य रखा था। लेकिन योजना के शुरुआती दो वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि तय लक्ष्य के मुकाबले अब तक बहुत कम युवाओं को इसका लाभ मिल पाया है।

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, पहले दो साल में 30 लाख युवाओं को इंटर्नशिप देने का लक्ष्य था, जबकि अब तक करीब 30 हजार युवाओं को ही योजना का लाभ मिला है। इस दौरान सरकार ने योजना के नियमों में कई बदलाव किए हैं। मासिक स्टाइपेंड बढ़ाया गया, इंटर्नशिप की अवधि घटाई गई और छोटे उद्योगों को भी इसमें शामिल किया गया। इसके बावजूद इंटर्नशिप के दौरान युवाओं को सही काम सीखने का मौका देना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

मोदी सरकार का 5 साल में 1 करोड़ इंटर्नशिप का वादा, 2 साल में सिर्फ 30 हजार को ही मिला लाभ

किसी को मिली नौकरी, तो किसी को बीच में छोड़नी पड़ी इंटर्नशिप

रिपोर्ट में शामिल युवाओं के अनुभव बताते हैं कि इस योजना का फायदा हर किसी को एक जैसा नहीं मिला। आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा की 23 वर्षीय पद्मा ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी, लेकिन उन्हें नौकरी नहीं मिल रही थी। जनवरी 2025 में उन्होंने एक बड़ी आईटी कंपनी में योजना के तहत इंटर्नशिप शुरू की। छह महीने की ट्रेनिंग और छह महीने के काम के अनुभव के बाद मार्च 2026 में उन्हें उसी कंपनी में पूर्णकालिक नौकरी मिल गई।

इसके उलट झारखंड के रांची निवासी 22 वर्षीय सुनील का अनुभव निराशाजनक रहा। उनके पास कंप्यूटर हार्डवेयर में टेक्निकल डिप्लोमा था। उन्हें एक माइक्रोफाइनेंस कंपनी में इंटर्नशिप मिली थी। उन्हें उम्मीद थी कि वहां कंप्यूटर से जुड़ी स्किल सीखने को मिलेगी, लेकिन कंपनी ने उन्हें गांवों में कर्ज की वसूली करने वाले एजेंट का काम सौंप दिया।

सुनील को संबंधित क्षेत्र में कोई खास स्किल सीखने का मौका नहीं मिला। परेशान होकर उन्होंने बीच में ही इंटर्नशिप छोड़ दी। रिपोर्ट के मुताबिक, वह अब भी बेरोजगार हैं।

लखनऊ के मोहित के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उन्होंने योजना के पहले चरण में एक सरकारी तेल रिफाइनरी कंपनी में इंटर्नशिप ली थी। उन्हें दफ्तर से जुड़ा काम सिखाने के बजाय पेट्रोल पंपों पर जाकर ग्राहकों को ऐप के जरिए भुगतान करने के लिए प्रेरित करने का काम दिया गया। इससे निराश होकर मोहित ने एक महीने के भीतर ही इंटर्नशिप छोड़ दी।

स्टाइपेंड बढ़ा, उम्र सीमा बदली; MSME को भी जोड़ा गया

योजना से जुड़ी चुनौतियों को देखते हुए सरकार ने इसके नियमों में बदलाव किए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल से शुरू हुए नए राउंड में इन बदलावों को लागू किया गया।

प्रमुख बदलाव इस प्रकार हैं:

  • स्टाइपेंड बढ़ा: मासिक राशि 5,000 रुपये से बढ़ाकर 9,000 रुपये कर दी गई।
  • अवधि कम हुई: इंटर्नशिप का समय 12 महीने से घटाकर 6 से 9 महीने कर दिया गया।
  • उम्र सीमा में बदलाव: आवेदन के लिए उम्र सीमा 21 से 24 साल के बजाय 18 से 25 साल कर दी गई।
  • ज्यादा छात्रों को मौका: मास्टर डिग्री धारकों और कॉलेज के अंतिम वर्ष के छात्रों को भी पात्रता के दायरे में शामिल किया गया।
  • कंपनियों का दायरा बढ़ा: शीर्ष 500 कंपनियों के अलावा अब सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) तथा उभरते सनराइज सेक्टरों को भी योजना से जोड़ा गया।

इन बदलावों का मकसद ज्यादा युवाओं को योजना से जोड़ना और उनके लिए इंटर्नशिप के अवसर बढ़ाना है।

आवेदन बढ़े, लेकिन इंटर्नशिप पूरी करने की दर घटी

रिपोर्ट के अनुसार, योजना में युवाओं की भागीदारी दर पहले चरण में 6.9 फीसदी और दूसरे चरण में 6.1 फीसदी थी। तीसरे चरण में यह बढ़कर 9.5 फीसदी हो गई। हालांकि, योजना से जुड़ने वाले युवाओं की संख्या बढ़ने के बावजूद इंटर्नशिप पूरी करने की दर में गिरावट दर्ज की गई।

आंकड़ों के मुताबिक, पहले चरण में 42.6 फीसदी युवाओं ने इंटर्नशिप पूरी की थी। दूसरे चरण में यह दर घटकर 39.4 फीसदी रह गई।

रिपोर्ट में बताया गया है कि बीच में इंटर्नशिप छोड़ने वाले कई युवाओं की शिकायत है कि उन्हें संबंधित क्षेत्र में ट्रेनिंग देने के बजाय फील्डवर्क या ऐसे काम सौंपे जाते हैं, जिनसे नई स्किल सीखने का मौका नहीं मिलता।

हालांकि, आईटी और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में इंटर्नशिप करने वाले कई युवाओं के अनुभव सकारात्मक रहे हैं। कुछ को इसी अनुभव के आधार पर स्थायी नौकरी भी मिली है।

कुल मिलाकर, प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना के सामने दो बड़ी चुनौतियां हैं, ज्यादा युवाओं तक अवसर पहुंचाना और इंटर्नशिप के दौरान उन्हें उनके क्षेत्र से जुड़ी उपयोगी ट्रेनिंग देना। योजना की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि युवाओं को केवल काम सौंपने के बजाय वास्तविक कौशल और रोजगार के बेहतर अवसर कितने मिलते हैं।

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