ज्ञानेश कुमार का विवाद थमा नहीं, अब चुनाव आयोग के दूसरे अधिकारी पर भी उठे सवाल
Election Commission News: चुनाव आयोग को लेकर चल रहा विवाद अभी पूरी तरह थमा नहीं है। एक मीडिया रिपोर्ट के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग के इस्तीफे की मांग उठने के बीच अब आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी के कामकाज को लेकर भी सवाल सामने आए हैं।
मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधु और विवेक जोशी ने कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन को अलग-अलग पत्र भेजे थे। दोनों ने वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त (DEC) मनीष गर्ग के एक फैसले पर आपत्ति जताई थी। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों पत्र 29 जुलाई को भेजे गए थे।
डीजी आईटी की फाइलों की निगरानी का मामला
मामला चुनाव आयोग की डीजी आईटी सीमा खन्ना की फाइलों की समीक्षा से जुड़ा था। मनीष गर्ग ने डीजी आईटी की फाइलों को उप चुनाव आयुक्त संजय कुमार के जरिए चुनाव आयुक्तों तक भेजे जाने की व्यवस्था में बदलाव किया था।
सुखबीर सिंह संधु और विवेक जोशी ने अपने पत्रों में कहा कि संजय कुमार अनुभवी अधिकारी हैं और उन्हें चुनाव प्रक्रिया की गहरी समझ है। ऐसे में आईटी विभाग पर उनके स्तर की निगरानी हटाना नियमों के खिलाफ है। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, 30 जुलाई को दोनों चुनाव आयुक्तों ने गर्ग के बदले हुए कार्य-वितरण को अलग रखते हुए पुरानी व्यवस्था जारी रखने को कहा था।
चुनाव आयोग ने क्या कहा?
विवाद के बीच चुनाव आयोग ने सफाई दी कि यह मामला किसी नीतिगत विवाद या आईटी विभाग के कामकाज से संबंधित नहीं था। आयोग के अनुसार, मामला प्रतिनियुक्ति पर तैनात एक अधिकारी के कामकाज से जुड़ा था। आयोग ने यह भी कहा कि मनीष गर्ग का आदेश पूरी तरह लागू नहीं हुआ और आईटी विभाग पर उप चुनाव आयुक्त की निगरानी जारी रही।
अगस्त में संजय कुमार अपने कैडर में वापस लौट गए। इसके बाद उनकी जिम्मेदारियां मनीष गर्ग संभाल रहे हैं और डीजी आईटी की फाइलें उनके जरिए चुनाव आयुक्तों तक पहुंच रही हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, मनीष गर्ग ने दोनों चुनाव आयुक्तों से मुलाकात कर अपना पक्ष रखा। उन्होंने बताया कि फैसला पदक्रम से जुड़ा था, क्योंकि डीजी आईटी सीमा खन्ना को हाल ही में पदोन्नति मिली थी और वह संजय कुमार से वरिष्ठ अधिकारी थीं।
कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन ने दोनों चुनाव आयुक्तों की शिकायतें कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को भेज दी हैं। हालांकि, सरकार का मानना है कि इस मामले में सीधे कार्रवाई करना चुनाव आयोग की स्वायत्तता में दखल माना जा सकता है।

