इमरान हाशमी और यामी गौतम की हक, क़ानून, आस्था और एक महिला के आत्मसम्मान की सधी हुई लड़ाई

Sandesh Wahak Digital Desk: बॉलीवुड की नई फ़िल्म ‘हक’ 1985 के ऐतिहासिक मोहम्मद अहमद खान बनाम शाहबानो बेगम केस से प्रेरित एक महत्वपूर्ण कोर्टरूम ड्रामा है। निर्देशक सुपर्ण वर्मा की यह फ़िल्म आस्था की जकड़न, क़ानून की जटिलता और आत्मसम्मान के लिए एक महिला के संघर्ष को पर्दे पर उतारती है। यह फ़िल्म अपने बेहतरीन अभिनय और गंभीर विषय वस्तु के कारण लंबे समय तक याद रखी जाएगी।

क्या है ‘हक’ की कहानी

फ़िल्म की कहानी शाज़िया बानो (यामी गौतम) और उनके पति अब्बास खान (इमरान हाशमी) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो 1960 के दशक के अंत में हुए वास्तविक शाज़िया बानो केस पर आधारित है। फ़िल्म दिखाती है कि कैसे एक सामान्य शादी धीरे-धीरे तलाक़, उपेक्षा और भरण-पोषण (maintenance) के कानूनी अधिकारों की लड़ाई में बदल जाती है।

यह कहानी सिर्फ एक निजी परेशानी नहीं है, बल्कि यह दिखाती है कि एक महिला कैसे परंपराओं, धार्मिक मान्यताओं और भारत की कानूनी व्यवस्था की जटिलताओं से जूझती है। फ़िल्म तीन तलाक, गुज़ारा भत्ता, सीआरपीसी की धारा 125 के तहत भरण-पोषण और धर्मनिरपेक्ष क़ानून तथा धार्मिक व्यक्तिगत क़ानूनों के बीच के तनाव जैसे गंभीर मुद्दों को छूती है।

निर्देशन और लेखन का संतुलन

निर्देशक सुपर्ण वर्मा ने कहानी को जबरदस्ती उपदेश देने के बजाय, स्वाभाविक रूप से खुलने दिया है। फ़िल्म की गति कभी-कभी धीमी लगती है, लेकिन यह जानबूझकर रखा गया संतुलन है। यह शाज़िया के संकट से पहले के जीवन को पर्याप्त जगह देती है, ताकि उसका टूटना स्वाभाविक लगे। फ़िल्म धर्म को ‘दुश्मन’ नहीं दिखाती, बल्कि यह बताती है कि कैसे धार्मिक व्याख्याएँ और सामाजिक जड़ता मिलकर कमज़ोर लोगों की आवाज़ दबा देती हैं। कोर्टरूम एक युद्धभूमि है, लेकिन असली भावनात्मक लड़ाईयाँ बेडरूम और रसोई में शुरू होती हैं।

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