अंतर्राष्ट्रीय न्याय दिवस: जब फ़ैज़, अज्ञेय और मंटो की कलम बन गई अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़

Sandesh Wahak Digital Desk: हर साल आज के दिन यानी 17 जुलाई को विश्व भर में मनाया जाने वाला ‘अंतर्राष्ट्रीय न्याय दिवस’ अक्सर अदालतों, कानूनों और अधिकारों तक की बातों में ही सिमटा नज़र आता है। इस दायरे से बाहर भी एक संसार है साहित्य का जो हमें याद दिलाता है कि इंसाफ़ केवल अदालतों और कानूनों में नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति, विवेक और संवेदना में भी ज़िंदा रहता है। ये लड़ाइयां अदालत के साथ-साथ साहित्य के उन पन्नों में भी दर्ज होती हुई आई हैं जिसे कोई अकेले बैठा पढ़ रहा होता है या उस कहानी में जो किसी अख़बार के कोने में छपी होती है ।

न्याय और साहित्य की चर्चा में कुछ नाम ख़ुद-ब-ख़ुद सामने आ खड़े होते हैं फ़ैज़, अज्ञेय और मंटो, जिन्होंने शब्दों को प्रतिरोध की ज़बान बना दिया।

तीनों की भाषा अलग, शैली अलग मगर मकसद साझा थे :

“अन्याय पर चुप रहना, अन्याय को चुने जाने के बराबर है !”

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़: कविता जो सत्ता से नहीं डरी

फ़ैज़ की शायरी में इश्क़ के साथ साथ इन्कलाब की आवाज़ भी  डंके के चोट पर उठती रही | उनकी कलम में क्रांति की गूँज भी थी, और जेल की सर्द रातों का सच भी।

उनकी कविता की मशहूर पक्तियां~

“बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल ज़बाँ अब तक तेरी है
तेरा सुत्वाँ जिस्म है तेरा
बोल कि जाँ अब तक तेरी है”

आज भी प्रतिरोध और अभिव्यक्ति की सबसे सशक्त आवाज़ मानी जाती है।

ये उस दौर में लिखी गई जब बोलने का अर्थ था सज़ा, गिरफ़्तारी या निर्वासन। लेकिन फ़ैज़ का अपनी पंक्तियों पर यकीन पुख्ता था। जब तक इंसान बोल सकता है, वो अन्याय से तब तक लड़ भी सकता है। इस नज़्म में फ़ैज़ ने उन सबके लिए जगह बनाई।

जो अदालतों के गलियारों तक नहीं पहुंच सके, लेकिन अन्याय के खिलाफ खड़े रहने की हिम्मत रखते थे। उनकी लेखनी सत्ता पर हमला करने के साथ साथ  पाठक के मन में सवाल छोड़ने का काम भी करती रही।

अज्ञेय: भीतर की स्वतंत्रता और बाहर की असहमति

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ ने जब “शेखर: एक जीवनी” लिखी, तो उस उपन्यास के पहले ही वाक्य से पढ़ने वाला ये तो समझ  गया कि ये  लेखन नीति से अधिक नैतिकता की ओर संकेत करता है।अज्ञेय के साहित्य में अन्याय के खिलाफ़ संघर्ष किसी आंदोलनात्मक नारे के रूप में नहीं, बल्कि मानव की निजी स्वतंत्रता के रूप में  उभर कर सामने आता है ।

वे कहते हैं कि न्याय तब तक अधूरा है जब तक मनुष्य भीतर से स्वतंत्र नहीं होता। उनके लिए न्याय कोई स्थूल व्यवस्था नहीं, बल्कि अंतर्मन की वह यात्रा है जो व्यक्ति को उसकी गरिमा और अस्मिता से जोड़ती है। साहित्य में उनके इस दृष्टिकोण ने विचारों के लोकतंत्र और संवेदनशील न्यायबोध को नई जमीन दी।

मंटो: नैतिकता के बाहर का यथार्थ

मंटो शायद उन चंद लेखकों में से हैं जिनकी कहानियाँ पढ़कर इंसान सिहर जाता है।

“ठंडा गोश्त”, “टोबा टेक सिंह”, “दस रुपये”

ये  कुछ उदाहरण हैं उन कहानियों के  जिनके तथ्य अदालतों की चारदीवारी में नहीं कहे जाते, लेकिन दर्द सामूहिक चेतना का हिस्सा ज़रूर  बन जाता है।

मंटो की लेखनी में ना कोई लाग-लपेट मिलता है , ना कोई इशारे वो जो देखते थे हूबहू पन्नों पर उतार देते थे। उन्होंने विभाजन की त्रासदी और औरतों पर हुए अत्याचार की सबसे ईमानदार और बेपर्दा तस्वीर बिना किसी झिझक और शर्म के, सबके सामने में पेश किया। कई बार उन्हें अश्लील कहकर कोर्ट में घसीटा गया।

लेकिन मंटो का जवाब हर बार साफ़ था:

“मैं वही लिखता हूँ, जो जानता हूँ, जो देखता हूँ।मैं तो बस अपनी कहानियों को एक आईना मानता हूँ,जिसमें समाज खुद को देख सके। अगर मेरी कहानियाँ बर्दाश्त नहीं की जा सकतीं, तो इसका मतलब यह है कि यह ज़माना ही ना काबिले बर्दाश्त है।”

साहित्य: न्याय की एक अदृश्य अदालत

इन तीनों लेखकों की लेखनी ने एक बात बार-बार कही:

जिसे समाज सुनने को तैयार नहीं होता, उसे साहित्य कह देता है।
  • फ़ैज़ की कविता ने व्यवस्था से उम्मीद बांधी,
  • अज्ञेय ने स्वतंत्रता के बगैर जीवन को अधूरा बताया,
  • मंटो ने उस ज़ख़्म को दिखाया जिसे सब छुपाना चाहते थे।

आज जब हम अंतरराष्ट्रीय न्याय दिवस मना रहे हैं,तो हमें अदालतों से बाहर भी उन जगहों को देखना चाहिए जहाँ इंसाफ़ के लिए संघर्ष जारी है। पन्नों में, कविताओं में और कहानियों में। क्योंकि कभी-कभी वो सवाल, जो कोर्ट में दर्ज नहीं होते वो साहित्य में दर्ज हो जाते हैं। और न्याय वहीं से शुरू होता है।

 

लेखिका: आफ़रीन बानो 

 

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