संभल हिंसा: सुप्रीम कोर्ट ने रद्द की मुल्ला अफरोज की NSA हिरासत, UP सरकार पर लगाया 10 लाख का जुर्माना

Sandesh Wahak Digital Desk: सुप्रीम कोर्ट ने संभल हिंसा मामले में नामजद आरोपी मुल्ला अफरोज की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत की गई एहतियाती हिरासत (प्रिवेंटिव डिटेंशन) को रद्द कर दिया है। सर्वोच्च अदालत ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसमें अफरोज की एनएसए के तहत हिरासत को सही ठहराया गया था। इसके साथ ही अदालत ने गैर-कानूनी तरीके से प्रिवेंटिव डिटेंशन ऑर्डर जारी करने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना भी ठोका है।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि राज्य सरकार महज पुलिस हिरासत में दिए गए किसी आरोपी के कबूलनामे को आधार बनाकर उसकी प्रिवेंटिव डिटेंशन का आदेश जारी नहीं कर सकती।

दिवंगत लॉ क्लर्क को समर्पित किया फैसला

मामले का फैसला सुनाते समय जस्टिस दीपांकर दत्ता भावुक नजर आए। उन्होंने इस ऐतिहासिक फैसले को अपने दिवंगत लॉ क्लर्क को समर्पित किया, जिनका उनके 27वें जन्मदिन से ठीक पहले असमय निधन हो गया था। बेंच ने 8 सितंबर को इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रखते हुए सवाल उठाया था कि क्या कस्टडी में दर्ज कराया गया बयान किसी नागरिक की आजादी छीनने और एहतियाती हिरासत तय करने के लिए पर्याप्त कानूनी आधार बन सकता है।

क्या था पूरा मामला

याचिकाकर्ता मुल्ला अफरोज संभल में शाही जामा मस्जिद के अदालती सर्वेक्षण के बाद भड़की हिंसा का आरोपी है, जिसमें 4 लोगों की मौत हो गई थी। घटना के करीब 54 दिन बाद पुलिस ने उसे अपनी कस्टडी में दर्ज बयान के आधार पर गिरफ्तार किया था।

यद्यपि इलाहाबाद हाई कोर्ट से उसे नियमित जमानत मिल गई थी, लेकिन प्रशासन ने 13 अक्टूबर 2025 को उसके खिलाफ एनएसए (NSA) लागू कर दिया। इसके बाद हाई कोर्ट ने भी इस प्रिवेंटिव डिटेंशन को हरी झंडी दे दी थी, जिसे अफरोज ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

शीर्ष अदालत में याचिकाकर्ता ने दलील दी कि पुलिस कस्टडी में लिया गया इकबालिया बयान कानूनन मान्य नहीं है। साथ ही, सिर्फ आपराधिक मामले दर्ज होने के आधार पर किसी को प्रिवेंटिव डिटेंशन में नहीं रखा जा सकता; इसके लिए प्रशासनिक स्तर पर स्वतंत्र और ठोस सबूतों का होना अनिवार्य है।

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