इन छोटी-छोटी बातों में छिपा है इंसानियत का असली चेहरा
Sandesh Wahak Digital Desk: जब हम हर प्रकार की त्रासदी , हिंसा, तनाव, टकराव , समाज की उदासीनता और सियासी हलचल से भरे अख़बारों के पन्ने पलटते हैं, तो ज़ेहन में सवाल उठता है- क्या सद्भावना आज भी समाज में जीवित है? क्या इस यांत्रिक जीवन की तीव्रता में निःस्वार्थ विचारों की कोई गूंज शेष है?
उत्तर आता है – हाँ।
मानवता अब भी जीवित है , बस वो पहले से अधिक मौन हो गई है।

छोटे प्रयास , बड़ा असर
वो युवक जो ऑफिस निकलने से पहले याद से बेज़ुबान जानवरो के लिए पानी रखना नहीं भूलता।
वो ऑटो ड्राइवर जो किराया कम लेता है क्योंकि सामने बैठा व्यक्ति थोड़ा परेशान दिखता है।
वो बुज़ुर्ग महिला जो मंदिर के बाहर बैठे बच्चे को मिठाई पकड़ा देती है।
इनका नाम भले ही कहीं प्रकाशित न हो, पर इनका प्रभाव उन हृदयों में स्थायी रूप से बस जाता है, जो उस समय कुछ टूटे हुए होते थे।
किसी का खोया हुआ बटुआ लौटा देना , किसी निरक्षर को रास्ता समझा देना या किसी अपरिचित के दुःख में सहभागी बन जाना।
ये सब वह छोटे काम हैं जिन पर कोई सुर्खियां नहीं बनती, पर मानवता के पहिए इन्हीं से चलते हैं।
कभी- कभी जो बातें हमारे लिए सामान्य होती हैं, वे ही किसी के लिए आश्वासन बन सकती हैं।
हम वो भी दे जाते हैं, जो हमें याद नहीं रहता।
हमारे द्वारा कहा गया एक वाक्य, किसी भीड़ में दिया गया एक मुस्कुराता उत्तर, अथवा किसी थके हुए मुख को देखकर मात्र एक सहज सिर हिलाना इन छोटे-छोटे व्यवहारों में भी करुणा की झलक होती है।
हम अक्सर मानते हैं कि मदद का अर्थ है कुछ बड़ा, कुछ दिखने लायक।
पर सच्चाई ये है कि ज़्यादातर बार, धरती उन्हीं छोटे-छोटे संयोग से सुशोभित होती है – जिन पर न कोई कैमरा होता है, न कोई पोस्ट।
जीवन के अत्यधिक आवश्यकताग्रस्त क्षणों में कोई प्यार से पूछ ले कि “ठीक हो?” थके हुए दिन के बाद कहा गया एक स्नेहभरा वाक्य , किसी अपरिचित से मिला छोटा-सा सहयोग या बस एक मुस्कान सामने वाले के जीवन में बड़ा असर छोड़ते हैं।
दुनिया अब भी संभली हुई है…क्योंकि
एक दुकानदार चुपचाप ₹10 कम ले लेता है, क्योंकि सामने वाला छात्र है।
एक रिक्शा चालक किसी अकेली युवती को बिना किसी सवाल-जवाब के सुरक्षित स्थान तक पहुंचा देता है|
एक युवा कार्यकर्ता सड़क पर रहने वाले पशुओं को भोजन, दवाई और देखभाल मुहैया करा रहा है ।
एक दोस्त, बिना बताए, किसी की फीस भर देता है।
पड़ोसी का एक छोटा सा फोन सिर्फ पूछने के लिए- “आपने खाना खा लिया?”
बारिश में साझा किया गया छाता,
या संकट में किसी अपरिचित के लिए की गई प्रार्थना ।
ये सब वो घटनाएं हैं जो कोई खबर नहीं बनती लेकिन मानवता की दुनिया में बड़ी हेडलाइन्स हैं।
अगर कोई पूछे कि किन हाथो ने दुनिया को थामे रखा है
तो जवाब में बड़ी योजनाएं नहीं, बल्कि वो ममत्व और उदारता होंगी जिसे हम सब कभी ना कभी छू चुके हैं।
आज के दौर में जहाँ एक ओर मदद सोशल मीडिया पर पोस्ट आडंबर या प्रदर्शन के लिए की जाती हैं , वही कुछ ऐसे छोटे प्रयास बेआवाज़, बेनाम, और नियत से भरे हुए होते हैं।
इनमें कोई प्रचार कोई कंटेंट और कोई एजेंडा नहीं होता ।
बस होता है एक इंसान का दूसरे इंसान को इंसान की तरह देखना।
संकट में किसी व्यक्ति के कंधे पर रखे हुए उस हाथ से लेकर
प्रार्थना में किसी के लिए उठने वाले उस हाथ तक ।
ये सब बातें छोटी और साधारण लग सकती हैं , लेकिन यही हैं जो थकती हुई आत्मा को संजीवनी देती हैं।
बदलाव की शुरुआत भी छोटी होती है
समाज को बदलने के लिए क्रांति जरूरी नहीं
जिस प्रकार एक पत्र के झरने से वृक्ष की स्थिरता नहीं डगमगाती वैसे ही एक सरल, किंतु सार्थक प्रयास से दुनिया तो नहीं बदल सकती लेकिन किसी एक व्यक्ति के लिए शायद वो क्षण बहुत कुछ बदल देता है।जो किसी भी प्रकार के क्रांति के लिए पर्याप्त है ।
अंत में…
हम सबके पास संसार को रूपांतरित करने की क्षमता भले ही सीमित हो, किंतु उसे सुरक्षित रखने की नीयत तो अनंत हो सकती है।
संसार को शायद आपके भाषण की ज़रूरत न हो, लेकिन आपकी संवेनशीलता, मृदुता, सौम्यता और मधुरता की विशेष आवश्यकता है ।
तो अगली बार जब आप समाचारपत्र पकड़े सोचें कि “मैं कर भी क्या सकता हूँ?”,
तो साहिर की इन पंक्तियों को दोहरा लीजिएगा जहां वो लिखते हैं –
“मुझे इंसानियत का दर्द भी बख़्शा है कुदरत ने,
मेरा मक़सद फ़क़त शोला–नवाई हो नहीं सकता !”
यदि आपकी भावना निर्मल है, तो आप उसी वक़्त समाज के लिए वरदान बन जाते हैं। समाज की असली शक्ति उसकी तकनीकी उन्नति में नहीं बल्कि उस भावना में है जो हम एक दूसरे के लिए रखते हैं । जब तक ये भावना जीवित है तब तक सद्गुण भी शेष है और मानवता भी सुरक्षित है|
लेखिका: आफ़रीन बानो
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