डिजिटल दुनिया के नाम – एक पुरानी पाठिका का पत्र
प्रिय डिजिटल दुनिया,
अब मेरी उंगलियाँ थोड़ी धीमी हो चली हैं।
आँखों पर चश्मा चढ़ चुका है,
और यादें धीरे-धीरे धुंधली हो रही हैं–
पर कुछ चीज़ें अब भी वैसी ही ताज़ा हैं,
जैसे सुबह की चाय और अख़बार की ख़ुशबू ।
वह पाठक हूँ
जो एक ज़माने में हर शब्द को ध्यान से पढ़ती थी,
हर हेडलाइन में देश की दिशा खोजती थी,
और हर संपादकीय में समाज की आत्मा ढूँढती थी।
पन्नों को पलटना,
कलम से तारीख़ लिखना,
और फिर उस लेख को संभालकर रखना
ये सब सिर्फ़ आदतें नहीं थीं,
ये मेरी सोचने की प्रक्रिया का हिस्सा थीं।
अब उम्र की दहलीज़ पर खड़ी होकर
तुम्हें देखती हूँ – तेज़, सुंदर, रंगीन और चालाक ।
तुम्हारी दुनिया में सबकुछ है
गति भी, आवाज़ भी, चमक भी, पहुँच भी
इसमें कोई दोराय नहीं कि
तुमने बहुतों को वो आवाज़ दी
जो पहले अनसुनी रह जाती थी।
मैं तुम्हें अपनाया, धीरे-धीरे, हिचकते हुए।
टचस्क्रीन पर अपनी उंगलियाँ चलाना सीखा,
नोटिफिकेशन की आवाज़ को पहचानना सीखा,
और धीरे-धीरे व्हाट्सएप पर ‘गुड मॉर्निंग’ भेजना भी ।
लेकिन क्या तुम्हें पता है, डिजिटल दुनिया-
कि तुम्हारी रीलों की रफ़्तार मुझे थका देती है?
और ट्रेंड्स की चमक मेरी कमज़ोर आँखों को चौंधिया देती है।
पर मैं यह नहीं कहूँगी कि तुम गलत हो – क्योंकि समय बदलता है,
और तुम्हारा आना इस बदलाव की ज़रूरत थी।
पर कभी-कभी दिल कहता है-
क्या बदलाव की इस दौड़ में हमने कुछ पीछे तो नहीं छोड़ दिया
शब्दों की गरिमा,
तथ्यों की गहराई,
और खबरों की आत्मा ।
जो खबर को केवल खबर नहीं,
एक अनुभव बनाती थी।
अब लोग पढ़ते कम
देखते ज़्यादा हैं
बहस होती है, पर संवाद नहीं ।
हर किसी के पास बोलने की आज़ादी है, पर सुनने का धैर्य कहीं खो गया है।
आज जब बच्चे मेरे पास बैठकर
मोबाइल की स्क्रीन में आँखें गड़ाए रहते हैं,
तो मैं उन्हें रोकती नहीं ।
मैं जानती हूँ – ये ज़माना तुम्हारा है।
पर फिर भी कभी-कभी
मैं चाहती हूँ कि वे रुकें,
मेरे पास बैठें,
और मैं उन्हें वो ख़बरें सुनाऊँ
जो सिर्फ़ घटनाएँ नहीं महसूस की गई कहानियाँ थीं।
डिजिटल दुनिया,
मैं तुमसे नाराज़ नहीं हूँ।
बस मेरी यह छोटी-सी गुज़ारिश है –
कि तुम्हारी रफ़्तार में
सोचने का समय बना रहे,
तुम्हारी चमक
सच्चाई की झलक भी दिखती रहे
और तुम्हारे ट्रेंड्स में
कभी-कभी पुरानी चिट्ठियों की सादगी भी लौट आया करे।
तुमने सब कुछ आसान कर दिया है
ख़बरें, रिश्ते, राय, और यहाँ तक कि आक्रोश भी।
लेकिन शायद इस “आसान” के पीछे
हमारी संवेदनाएँ थोड़ी और जटिल हो गई हैं।
तुम तेज़ चलो – बहुत अच्छा है
पर चलो इस तरह
कि पीछे चलता कोई पुराना पाठक
खुद को बिल्कुल अकेला न महसूस करे ।
मैं बूढ़ी हो रही हूं,
शायद अगली पीढ़ी मुझे भुला दे,
पर मैं जानती हूँ –
कि शब्दों से रिश्ता रखने वाले कभी खोते नहीं
हम बस किसी दीवार की ताख़ में रखी किताब की तरह होते हैं,
जिन्हें वक़्त आने पर फिर से पलटा जाता है।
लेखिका- आफ़रीन बानो
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