इकरा हसन का दोष क्या है?

Sandesh Wahak Digital Desk: कैराना लोकसभा सीट से सपा सांसद इकरा हसन फिर सुर्खियों में हैं। कांवडिय़ों का स्वागत और उन्हें अपने हाथों से भोजन परोसकर इकरा हसन ने भाईचारे का संदेश दिया तो दूसरी ओर उन्हें सहारनपुर कलेक्ट्रेट में एडीएम की अभद्रता का शिकार होना पड़ा। यही नहीं करणी सेना के नेता योगेंद्र सिंह राणा ने उन पर बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी की।

हालांकि काफी विरोध के बाद एडीएम के खिलाफ जांच बैठाई जा चुकी और आज राणा के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज की गयी है लेकिन असली सवाल यह है कि इकरा का दोष क्या है? क्या कांवड़ियों को भोजन परोसना, एक जनप्रतिनिधि की हैसियत से आम जनता की समस्याओं को अधिकारियों के संज्ञान में लाना या भाजपा के कट्टर प्रतिद्वंद्वी समाजवादी पार्टी के टिकट पर जीत दर्ज कर सांसद बनना या कुछ और? जिस तरह इकरा हसन को विवादों में घसीटा जा रहा है, एक महिला के मान-सम्मान पर चोट पहुंचाने की कोशिश की जा रही है, उसे कतई उचित नहीं कहा जा सकता है?

प्रदेश की सियासत में इकरा हसन का परिवार नया नहीं है। इकरा करीब नौ वर्षों से कैराना की राजनीति में सक्रिय हैं। वह पूर्व सांसद तबस्सुम हसन की बेटी और नाहिद हसन की बहन हैं। इकरा की शुरुआती शिक्षा भले ही कैराना में हुई हो लेकिन उन्होंने 12वीं दिल्ली के क्वींस मेरी स्कूल से पास किया। लेडी श्रीराम कॉलेज से ग्रेजुएशन, दिल्ली विश्वविद्यालय से एलएलबी व इंटरनेशनल लॉ एंड पालिटिक्स में पोस्ट ग्रेजुएशन यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन से किया है। सोशल मीडिया पर भी वे सक्रिय रहती हैं।

उनके भाई नाहिद हसन को जब 15 जनवरी 2022 को पुलिस ने कोर्ट में गैंगस्टर के मुकदमे में सरेंडर करने से पहले गिरफ्तार किया तो इकरा ने हसन परिवार की राजनीति की बागडोर अपने हाथों में ले ली थी। कैराना लोकसभा सीट पर बड़ा उलटफेर करते हुए सपा की इकरा हसन ने 69116 मतों के अंतर से चुनाव जीता था। 2024 के लोकसभा चुनाव में इकरा को 528013 वोट मिले तो उनके विरोधी रहे भाजपा के प्रदीप कुमार के खाते में 4,58,897 वोट आए थे।

तबस्सुम हसन

कैराना संसदीय सीट पर 1991 से लेकर अब तक के 9 चुनावों में भाजपा व राष्ट्रीय लोक दल को तीन-तीन बार जीत मिली है। 1991 के बाद के चुनावों में तबस्सुम हसन यहां से 2 बार जीती थीं। क्षेत्र को मुस्लिम व जाट बाहुल्य माना जाता है। यहां मुस्लिम 6 लाख, जाट 2 लाख, एससी 2.25 लाख, कश्यप 1.40 लाख, सैनी1.25 लाख, गुर्जर1.30 लाख, ब्राह्मण 40 हज़ार, ठाकुर 45 हज़ार, बनिया 50 हज़ार, पंजाबी 25 हज़ार, अन्य ओबीसी 65 हज़ार, पाल 50 हज़ार और यादव 4 हजार हैं। जाहिर है, मुस्लिम बाहुल्य सीट होने के बाद भी यहां जाट, गुर्जर और एससी मतदाता निर्णायक हैं।

सपा सांसद इकरा हसन और एडीएम संतोष बहादुर सिंह

इकरा को हिंदू वोटरों का भी साथ मिला। ऐसे में सभी धर्म और जाति के प्रतिनिधि की हैसियत से इकरा यदि कांवडिय़ों का स्वागत करती हैं या वे शमा परवीन के साथ एडीएम से जनसमस्याओं को लेकर मिलने जाती हैं तो इसमें गलत क्या है? क्या मुस्लिम महिला के नाते उनको निशाना बनाने की कोशिश की जा रही है? एक जुलाई को सांसद इकरा हसन और नगर पंचायत अध्यक्ष शमा परवीन एडीएम कार्यालय पहुंची थीं। इसके बाद कैराना सांसद की ओर से शासन को शिकायत की गई जिसमें बताया कि एडीएम ने उनके साथ अभद्रता की और कार्यालय से बाहर जाने के लिए कहा। काफी विरोध के बाद जांच शुरू हुई है। हद तो तब हो गयी जब करणी सेना के नेता योगेंद्र राणा ने सोशल मीडिया पर उनसे निकाह करने जैसी आपत्तिजनक टिप्पणी की।

UP BJP District President

यह टिप्पणी न केवल सांसद बल्कि एक महिला की गरिमा के खिलाफ है और देश ऐसी भाषा को स्वीकार नहीं कर सकता है। हालांकि राणा के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गयी है लेकिन इसने भाजपा सरकार के उस दोहरे रवैए को उजागर कर दिया है जो एक ओर बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का स्लोगन देती है और जब महिला के मान-सम्मान की बात आती है तो आरोपी के खिलाफ कार्रवाई में लेटलतीफी करती है। एडीएम के खिलाफ जांच का कोई परिणाम अभी सामने नहीं आया है। इकरा के साथ हुए इन वाकयों और उस पर सरकार का रवैया क्या भाजपा के सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास के नारे को कठघरे में नहीं खड़ा करता है?

 

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