बाफिला घोटाला: तीन हजार करोड़ से ऊपर का भूमि घोटाला, FIR सिर्फ एक धारा में दर्ज

सीएम योगी और हाईकोर्ट भूमाफियाओं पर सख्त, सरकारी तंत्र मेहरबान, संरक्षणदाता अफसरों पर कब होगी कार्रवाई

Sandesh Wahak Digital Desk: सीएम योगी भूमाफियाओं पर सख्त है। लेकिन पुलिस-सरकारी तंत्र भूमाफियाओं पर मानो मेहरबान है। लखनऊ में बहुजन निर्बल वर्ग सहकारी गृह निर्माण समिति और द हिमालयन सहकारी आवास समिति का अरबों का भूमि घोटाला इसकी नजीर है।

हाईकोर्ट के आदेश पर भले एफआईआर दर्ज हुई है, पर मजमून न सिर्फ बेहद कमजोर है बल्कि हजारों करोड़ के फर्जीवाड़े में धारा भी सिर्फ एक लगाकर कर्तव्यों की इतिश्री की गई है। ऐसा लग रहा है कि अफसरों ने हाईकोर्ट में गर्दन बचाने के लिए ही एफआईआर दर्ज करने की औपचारिकता निभाई है।

FIR सिर्फ एक धारा में दर्ज

तीन हजार करोड़ से ज्यादा के भूमि घोटाले में सिर्फ भूमाफिया गैंगस्टर ही नहीं शामिल हैं बल्कि दिवंगत दिलीप बाफिला के करीबी सफेदपोश-अफसर भी अहम कड़ी हैं। सहकारिता, एलडीए, आवास विकास और पुलिस से जुड़े अफसर इतने बड़े घोटाले में कटघरे में हैं। एक भी अफसर-कर्मी के ऊपर कार्रवाई नहीं हुई और न ही एफआईआर में उनका कोई जिक्र है। गाजीपुर थाने में महेंद्र तिवारी की तरफ से जो एफआईआर दर्ज हुई है। उसमें सिर्फ बीएनएस के तहत धारा 318(4) का जिक्र है। पुराने कानून में इसे धोखाधड़ी के अपराध के लिए धारा 420 के तौर पर जाना जाता था। धारा 318(4) में दोषी को सात साल तक का कारावास, या जुर्माना, या दोनों का दंड हो सकता है।

FIR

इससे पहले पुलिस को एफआईआर दर्ज करने के लिए तीन पत्र दिए गए थे। एफआईआर दर्ज नहीं की गयी। हाईकोर्ट की सख्ती पर पुराने पत्र पर एफआईआर दर्ज करके एक धारा का उल्लेख करके खानापूर्ति की गयी है। हाईकोर्ट के आदेश के आधार पर एफआईआर दर्ज होती तो कई अफसरों का भी जेल जाना तय था।

क्या घोटालेबाजों को पर्दे के पीछ से मिल रहा संरक्षण?

हाईकोर्ट ने एसपी स्तर के पुलिस अफसर को इस एफआईआर की निगरानी के लिए निर्देशित किया है। इसके बावजूद इतने बड़े आर्थिक अपराध में गंभीर धाराएं नहीं लगाई गयीं है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में जितनी सख्ती दिखाई, एफआईआर उतनी ही हल्की दर्ज कराकर घोटालेबाज़ों को परदे के पीछे से मानो संरक्षण दिया जा रहा है। हाईकोर्ट ने पैसे की रिकवरी व मनीलांड्रिंग जैसे गंभीर पहलुओं को अपने आदेश में छुआ है। सरकारी तंत्र इन्ही गंभीर पहलुओं से दूर भाग रहा है क्योंकि इनकी जांच से कई सफेदपोश और रसूखदार चेहरे बेनकाब होते देर नहीं लगेगी।

द हिमालयन सहकारी आवास समिति पर सिर्फ जुर्माना, एफआईआर क्यों नहीं?

सहकारिता विभाग के एक अफसर के मुताबिक हमने पुलिस को एफआईआर दर्ज करने के लिए तीन पत्र पहले दिए थे। एफआईआर दर्ज नहीं हुई। समिति के सचिव ने जो नाम दिए हैं। उन पर केस दर्ज हुआ है। हिमालयन समिति आवास विकास के क्षेत्राधिकार में है। अपर आवास आयुक्त(कोआपरेटिव) विनय कुमार मिश्र से इस संबंध में पक्ष जानने के लिए कई बार फोन किया गया। उन्होंने फोन नहीं उठाया। आवास विकास परिषद ने द हिमालयन सहकारी आवास समिति पर सात करोड़ का जुर्माना और डीएम को प्रशासक बनाकर अपने दायित्व की इतिश्री कर डाली है। हिमालयन समिति में हुए बेहिसाब भूमि घोटालों पर एफआईआर दर्ज नहीं कराई गयी है क्योंकि ऐसा होने पर बाफिला परिवार के सदस्यों पर पूरी तरह शिकंजा कसना तय है।

आखिर लैंड ऑडिट कब?

हाईकोर्ट ने समिति की लाखों वर्ग मी. भूमि के ऑडिट के आदेश अफसरों को दिए हैं। पुलिस अफसरों/स्टेट अथॉरिटी की जिम्मेदारी तय की है। ऑडिट पर अफसर गंभीर नहीं हैं। पिछले दस वर्षों की सेलडीड व पूरी भूमि ऑडिट में शामिल करने को कहा है।

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