संपादक की कलम से : किस राह पर गठबंधन?

Sandesh Wahak Digital Desk: पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम का सबसे अधिक असर भाजपा के खिलाफ बनाए गए 28 दलों के विपक्षी गठबंधन पर दिख रहा है। तेलंगाना को छोड़कर मिजोरम, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की करारी शिकस्त ने विपक्षी गठबंधन के प्रमुख दलों के साथियों के बीच तकरार उभरकर सामने आ गयी है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े की बुलाई गयी बैठक में विभिन्न दलों के कई प्रमुख नेताओं के नहीं पहुंचने से इसे टालना पड़ा।

हैरानी की बात यह है कि इस गठबंधन के सूत्रधार और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी बैठक से किनारा कर गए हैं। तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी व सपा मुखिया अखिलेश यादव भी बैठक में नहीं जा रहे थे। ममता ने तो साफ कर दिया कि उन्हें बैठक के बारे में कोई जानकारी ही नहीं थी।

सवाल यह है कि :

  • क्या इस गठबंधन का हश्र भी अन्य गठबंधनों की तरह होने वाला है?
  • क्या ऐसे ही कांग्रेस और क्षेत्रीय दल भाजपा से दो-दो हाथ कर पाएंगे?
  • क्या कांग्रेस की सबको साथ नहीं लेकर चलने की रणनीति के कारण स्थितियां विपरीत हो गयी हैं?
  • क्या कांग्रेस को मिली चुनावी हार के कारण क्षेत्रीय दल लोकसभा सीटों पर मोलभाव करने के लिए ऐसी पैंतरेबाजी दिखा रहे हैं?
  • क्या गठबंधन साथियों में बढ़ता मतभेद आम चुनाव में भाजपा की राह को आसान कर देगा?

भाजपा के खिलाफ ताजा-ताजा बना महागठबंधन यानी इंडिया पहले ही दिन से विवादों के घेरे में था। इसका गठन नीतीश की तमाम कोशिशों के बाद हुई। इसकी तीन-चार बैठक भी हुईं लेकिन न तो किसी को संयोजक बनाया गया न ही लोकसभा सीटों के बंटवारे को लेकर कोई रणनीति बनायी गयी। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव तक यह तकरार सतह पर आ गयी।

इंडिया गठबंधन की बैठक टली

सबसे पहला टकराव सीटों को लेकर कांग्रेस और सपा के बीच हुआ। कांग्रेस ने मध्य प्रदेश में सपा को पांच सीटें देना भी गंवारा नहीं किया। लिहाजा सपा ने यहां स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ा और इसमें दो राय नहीं कि इसका नुकसान दोनों ही पार्टियों को चुनाव में उठाना पड़ा। अब जब चुनाव परिणाम के बाद कांग्रेस ने सभी दलों की मीटिंग बुलाई तो कई प्रमुख दलों के अध्यक्ष नहीं पहुंचे और मजबूरी में बैठक को टाल दिया गया।

दरअसल, कांग्रेस और गठबंधन में शामिल क्षेत्रीय दल दोनों ही चुनाव परिणामों पर नजर बनाए हुए थे। कांग्रेस और क्षेत्रीय दल इस चक्कर में थे कि अगर वे बेहतर करते हैं तो सीटों के बंटवारे में अच्छा मोलभाव कर सकेंगे लेकिन स्थितियां विपरीत हो चुकी हैं।

इस चुनाव में गठबंधन में शामिल क्षेत्रीय दल पूरी साफ हो गये तो कांग्रेस को कारारी शिकस्त का सामना करना पड़ा। ऐसे में दोनों एक ही जमीन खड़े हैं और हार का ठीकरा कांग्रेस पर फोड़ रहे हैं। फिलहाल जो स्थितियां दिख रही हैं वह गठबंधन के भविष्य के लिए ठीक नहीं है। साफ है इसका सीधा फायदा लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिलेगा।

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