FCRA बिल पर US से आई तीखी प्रतिक्रिया, सांसद बोले- भारत-अमेरिका रिश्तों पर पड़ेगा असर

FCRA Amendment Bill: भारत में विदेशी फंडिंग से जुड़े FCRA (Foreign Contribution Regulation Act) संशोधन विधेयक को लेकर विवाद अब अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच गया है। प्रस्तावित कानून पर अमेरिका के रिपब्लिकन सांसद राइली मूर ने तीखी प्रतिक्रिया दी है।

उन्होंने दावा किया कि यदि यह विधेयक मौजूदा स्वरूप में आगे बढ़ता है तो इसका असर भारत और अमेरिका के द्विपक्षीय संबंधों पर पड़ सकता है। वहीं केंद्र सरकार का कहना है कि संशोधन का उद्देश्य विदेशी फंडिंग व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाना है।

अमेरिकी सांसद ने क्यों जताई आपत्ति?

राइली मूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट कर आरोप लगाया कि प्रस्तावित संशोधन सरकार को चर्चों और चैरिटी संस्थाओं पर अधिक नियंत्रण का अधिकार देगा।

उन्होंने भारत में ईसाई समुदाय के लंबे इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि इस तरह के बदलाव धार्मिक संस्थाओं के लिए चिंता का विषय हो सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अगर भारत इस विधेयक को आगे बढ़ाता है तो इससे भारत-अमेरिका संबंधों पर असर पड़ सकता है।

क्या है FCRA संशोधन विधेयक?

विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक यानी FCRA Amendment Bill को पहले बजट सत्र में लोकसभा में पेश किया गया था और अब इसे मानसून सत्र में चर्चा के लिए सूचीबद्ध किया गया है। मौजूदा कानून के तहत विदेशी चंदा प्राप्त करने वाले NGO, चैरिटेबल ट्रस्ट, शैक्षणिक और धार्मिक संस्थानों को गृह मंत्रालय से पंजीकरण कराना होता है, जिसे हर पांच साल में नवीनीकृत कराया जाता है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार 15 जुलाई 2026 तक देश में 14,449 सक्रिय FCRA पंजीकृत संस्थाएं थीं। वर्ष 2019 से 2022 के बीच इन संस्थाओं को 55,741 करोड़ रुपये का विदेशी अंशदान प्राप्त हुआ।

संशोधन में क्या बड़े बदलाव प्रस्तावित हैं?

प्रस्तावित संशोधन के तहत यदि किसी संस्था का FCRA पंजीकरण रद्द होता है या उसका नवीनीकरण नहीं होता, तो केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त अधिकारी उसके विदेशी फंड और उससे अर्जित संपत्तियों का प्रबंधन संभाल सकेगा।

इसके अलावा:

  • पिछले दो वर्षों में 10 लाख रुपये से कम विदेशी फंड पाने वाली संस्थाओं को नवीनीकरण के लिए पात्र नहीं माना जाएगा।
  • विदेशी चंदे को किसी अन्य संस्था को ट्रांसफर करने पर कड़ी रोक लगाने का प्रस्ताव है।
  • विदेशी फंड के उपयोग की समयसीमा तय होगी।
  • वेबसाइट और सोशल मीडिया पर परियोजनाओं से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक करने जैसी सख्त शर्तें भी लागू की जाएंगी।

केंद्र सरकार का कहना है कि इन बदलावों का उद्देश्य विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता बढ़ाना और धन के उपयोग पर प्रभावी निगरानी सुनिश्चित करना है, जबकि विधेयक को लेकर राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज हो गई है।

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