बशीर बद्र का अनोखे संयोग के साथ हुआ था जन्म, बकरीद के मुकद्दस दिन पर ही दुनिया से ली आखिरी रुखसती

Sandesh Wahak Digital Desk: अपनी मखमली आवाज, बेहद नरम लहजे और रूह को छू लेने वाले शेरों से करोड़ों दिलों पर राज करने वाले उर्दू के अज़ीम शायर डॉ. बशीर बद्र अब हमारे बीच नहीं रहे। डिमेंशिया (भूलने की बीमारी) और उम्र संबंधी अन्य जटिलताओं से जूझ रहे 91 वर्षीय बशीर बद्र ने बकरीद के मुकद्दस दिन भोपाल के ईदगाह हिल्स स्थित अपने निवास पर अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से देश-दुनिया के अदबी हलकों (साहित्यिक गलियारों) में गहरे सन्नाटे और शोक की लहर दौड़ गई है।

शेरों में हमेशा जिंदा रहेंगे बद्र

पिछले काफी समय से डॉ. बशीर बद्र की तबीयत लगातार नासाज चल रही थी। डिमेंशिया के गंभीर दौर से गुजर रहे इस महान शायर की याददाश्त लगभग पूरी तरह खत्म हो चुकी थी, यहाँ तक कि वे अपने बेहद करीबियों को भी पहचानने की स्थिति में नहीं थे। खराब स्वास्थ्य के चलते उन्होंने बीते कुछ वर्षों से मुशायरों और सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह दूरी बना ली थी। लेकिन उनके लिखे शेर आज भी आम और खास, दोनों की जुबान पर जिंदा हैं।

जन्म और मृत्यु का अद्भुत और दुर्लभ संयोग

बशीर बद्र का जीवन और उनकी विदाई, दोनों ही इस्लामी कैलेंडर के लिहाज से बेहद दुर्लभ संयोगों से जुड़ी रही हैं। जिस साल उनका जन्म हुआ था, वह वर्ष बेहद खास था, क्योंकि उस एक ही अंग्रेजी साल की शुरुआत और अंत में दो बार पवित्र रमजान का महीना पड़ा था। इसके अलावा, जिस बकरीद के पावन पर्व पर मुस्लिम समाज हजरत इब्राहिम की सुन्नत को याद करते हुए इंसानियत, त्याग और इबादत का संदेश देता है, ठीक उसी पवित्र दिन बशीर बद्र ने इस फानी दुनिया को अलविदा कह दिया। धार्मिक जानकारों के मुताबिक, चांद पर आधारित हिजरी कैलेंडर और सूर्य पर आधारित अंग्रेजी कैलेंडर के दिनों के अंतर के कारण ऐसे दुर्लभ संयोग सदियों में एकाध बार ही बनते हैं।

मोहब्बत और इंसानी सरोकारों के अमर शायर

डॉ. बशीर बद्र ने पारंपरिक और क्लिष्ट उर्दू शायरी से इतर, आम बोलचाल के शब्दों को अपनी गजलों का हिस्सा बनाया। उन्होंने इंसानी रिश्तों की कशमकश, बेपनाह मोहब्बत, जुदाई के दर्द और समाज की बदलती हकीकतों को बेहद सादगी और संजीदगी के साथ पन्नों पर उकेरा। उनका जाना उर्दू शायरी के एक पूरे युग का अंत है।

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