Kanpur News: शिशु से किशोरावस्था तक आहार पर सेमीनार में हुआ गहन मंथन
Kanpur News: कानपुर के रेजेंटा होटल में एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स, कानपुर की ओर से बाल पोषण पर आधारित ‘Central IAP A to Z Pediatrics Nutritional Module’ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य शिशु काल से लेकर किशोरावस्था तक बच्चों के पोषण, स्तनपान, पूरक आहार और स्वस्थ खान-पान की आदतों से जुड़े नवीनतम वैज्ञानिक एवं चिकित्सीय पहलुओं को बाल रोग विशेषज्ञों के साथ साझा करना था।
सेमीनार का शुभारंभ एकेडमी के अध्यक्ष डॉ. जेके गुप्ता ने दीप प्रज्वलित कर किया। इस आयोजन में कानपुर सहित लखनऊ से आए प्रमुख विशेषज्ञ फैकल्टी डॉ. संजय निरंजन, डॉ. अमित रस्तोगी और डॉ. शैलेन्द्र गौतम ने विचार रखे। इस ज्ञानवर्धक सत्र में शहर के लगभग 40 बाल रोग विशेषज्ञों ने भाग लिया।
जन्म के पहले घंटे में स्तनपान संजीवनी समान: डॉ. शैलेन्द्र गौतम
स्तनपान पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए डॉ. शैलेन्द्र गौतम ने कहा कि माँ का दूध शिशु के लिए न केवल सर्वोत्तम आहार है, बल्कि यह प्राकृतिक रूप से रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) भी प्रदान करता है। उन्होंने प्रसव के तुरंत बाद पहले घंटे में स्तनपान शुरू करने, शुरुआती 6 महीने तक केवल माँ का दूध (एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग) देने और उसके बाद पूरक आहार के साथ स्तनपान जारी रखने की सलाह दी। उन्होंने नवजात को दिए जाने वाले घुट्टी (प्री-लैक्टियल फीड), बाहरी डिब्बे वाले दूध और बोतल से दूध पिलाने से बचने की हिदायत देते हुए माताओं को उचित लैक्टेशन सपोर्ट देने की आवश्यकता पर जोर दिया।
देश में केवल 9.2% शिशुओं को मिल पाता है न्यूनतम स्वीकार्य आहार
लखनऊ से आए विशेषज्ञ डॉ. संजय निरंजन ने पूरक आहार (कम्प्लीमेंट्री फीडिंग) पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि 6 महीने की उम्र के बाद केवल माँ का दूध शिशु की बढ़ती पोषण जरूरतों के लिए पर्याप्त नहीं होता, इसलिए समय पर विविधतापूर्ण आहार देना जरूरी है। उन्होंने डब्ल्यूएचओ के पोषण मानकों न्यूनतम आहार विविधता (MDD), न्यूनतम भोजन आवृत्ति (MMF) और न्यूनतम स्वीकार्य आहार (MAD) का जिक्र करते हुए देश के चिंताजनक आंकड़े साझा किए। उन्होंने बताया कि भारत में 6-8 महीने के केवल 54.6% बच्चों को समय पर पूरक आहार मिलता है, जबकि न्यूनतम स्वीकार्य आहार केवल 9.2% शिशुओं तक ही पहुँच पाता है। भारतीय बच्चों के भोजन में केवल अनाज की अधिकता रहती है, जबकि आयरन और प्रोटीन युक्त विविध खाद्य पदार्थों की भारी कमी देखी जाती है।
किशोरी और किशोरों में तेजी से बढ़ रहा कुपोषण का दोहरा बोझ
किशोरावस्था में पोषण (एडोलसेंट न्यूट्रिशन) विषय पर बोलते हुए डॉ. अमित रस्तोगी ने कहा कि किशोरावस्था तीव्र शारीरिक विकास का चरण है, जहाँ पोषक तत्वों की मांग बढ़ जाती है। भारत में किशोर आबादी ‘कुपोषण के दोहरे बोझ’ (अल्पपोषण और मोटापा) से जूझ रही है। एक तरफ जहाँ सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी है, वहीं दूसरी तरफ जंक फूड और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स (चिप्स, बर्गर, इंस्टेंट नूडल्स) के अत्यधिक सेवन से मोटापा व मेटाबोलिक बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है। उन्होंने किशोरों को नाश्ता न छोड़ने, हरी सब्जियों, फलों व दालों को नियमित आहार में शामिल करने के लिए प्रेरित किया।
संगोष्ठी के समापन सत्र में विशेषज्ञों ने एक स्वर में कहा कि शिशु काल से लेकर किशोरावस्था तक का सही पोषण ही व्यक्ति के पूरे जीवन के बेहतर स्वास्थ्य की नींव रखता है। ऐसे में बाल रोग विशेषज्ञों की भूमिका केवल बीमारियों के इलाज तक सीमित न रहकर माता-पिता की काउंसलिंग और बच्चों में स्वस्थ जीवनशैली विकसित करने में सबसे महत्वपूर्ण है। अंत में डॉ. शाइनी सेठी ने सभी आमंत्रित वक्ताओं, आयोजकों और प्रतिभागी डॉक्टरों का धन्यवाद ज्ञापित किया।

