डेटा गोपनीयता कानून के खिलाफ 21 मीडिया संस्थानों ने मोदी सरकार को SC में दी चुनौती

DPDP Act Supreme Court: मोदी सरकार पर अक्सर उद्योगपति मुकेश अंबानी और गौतम अडानी को फायदा पहुंचाने के आरोप लगते रहे हैं। लेकिन अब अंबानी और अडानी से जुड़े मीडिया संस्थानों ने ही सरकार के डेटा गोपनीयता कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। देश के 21 मीडिया घरानों ने 698 पन्नों की याचिका दाखिल कर आशंका जताई है कि नए कानून से खोजी पत्रकारिता प्रभावित हो सकती है। इससे भ्रष्टाचार और बड़े घोटालों को उजागर करना भी मुश्किल हो सकता है।

विवाद Digital Personal Data Protection Act (DPDP Act) को लेकर है। सरकार का कहना है कि इस कानून का मकसद लोगों के डिजिटल डेटा की सुरक्षा करना और बड़ी टेक कंपनियों को जवाबदेह बनाना है। वहीं, मीडिया संस्थानों की आपत्ति है कि कानून में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट नहीं दी गई है। उनका तर्क है कि इससे प्रेस की स्वतंत्रता और जनहित में खबरें प्रकाशित करने की क्षमता पर असर पड़ सकता है।

डेटा कानून पर मीडिया संस्थानों को क्यों है आपत्ति?

Digital News Publishers Association (DNPA) ने 6 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की। इस संगठन में मुकेश अंबानी के स्वामित्व वाला Network18, गौतम अडानी का NDTV, The Indian Express और Times Group समेत कई प्रमुख मीडिया संस्थान शामिल हैं।

याचिका में कहा गया है कि यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और सिंगापुर जैसे देशों और क्षेत्रों में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट कानूनी छूट का प्रावधान है। लेकिन भारत के नए डेटा कानून में ऐसी छूट नहीं दी गई है।

Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक, अगस्त में मीडिया कंपनियों और सरकार के बीच इस मुद्दे पर बैठक हुई थी। उस दौरान सरकार ने मौखिक आश्वासन दिया था कि नए कानून में प्रेस की आजादी का ध्यान रखा जाएगा। हालांकि, प्रस्तावित प्रावधानों में पत्रकारिता के लिए लिखित छूट नहीं दिखी। इसके बाद मीडिया संस्थानों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया।

नए नियम मई 2027 में लागू होने हैं। इनके तहत किसी व्यक्ति के डेटा का इस्तेमाल करने से पहले उसकी सहमति लेना जरूरी होगा। इसमें फोन रिकॉर्ड, वित्तीय लेनदेन से जुड़ी जानकारी और अन्य निजी जानकारियां शामिल हो सकती हैं।

खोजी पत्रकारिता और भ्रष्टाचार की खबरों पर क्या पड़ेगा असर?

DNPA की प्रमुख चिंता है कि कानून के तहत डेटा इस्तेमाल करने की शर्तें खोजी पत्रकारिता के काम में रुकावट बन सकती हैं। उदाहरण के तौर पर, यदि कोई पत्रकार किसी बड़े नेता या भ्रष्ट अधिकारी से जुड़े घोटाले की जांच कर रहा है, तो संबंधित व्यक्ति का डेटा इस्तेमाल करने से पहले उसे इसकी जानकारी देने और उसकी सहमति लेने की जरूरत पड़ सकती है।

याचिका में तर्क दिया गया है कि जांच की जानकारी पहले ही संदिग्ध नेता या अधिकारी तक पहुंचने से सबूत नष्ट होने या गवाहों को डराने का खतरा हो सकता है। इससे खबर प्रकाशित होने से पहले ही जांच प्रभावित हो सकती है।

मीडिया संस्थानों का कहना है कि ऐसे प्रावधान खोजी पत्रकारिता को कमजोर कर सकते हैं और पत्रकारों को घटनाओं का केवल निष्क्रिय रिकॉर्ड बनाने तक सीमित कर सकते हैं। याचिका में इन प्रावधानों को पहले से लागू सेंसरशिप जैसा बताया गया है।

खबर हटाने के अधिकार पर भी सवाल

मीडिया संस्थानों ने कानून में डेटा मिटाने के अधिकार को लेकर भी चिंता जताई है। इसके तहत कोई व्यक्ति अपनी सहमति वापस लेकर इंटरनेट या किसी प्लेटफॉर्म से अपना डेटा हटाने की मांग कर सकता है।

याचिका के मुताबिक, कानून में जनहित की रक्षा के लिए पर्याप्त सुरक्षा प्रावधान नहीं हैं। ऐसे में किसी नेता या अपराध के आरोपी से जुड़ी तथ्यात्मक खबर को हटाने या उसमें बदलाव करने की मांग की जा सकती है। मीडिया संस्थानों को आशंका है कि इस अधिकार का इस्तेमाल जनहित में प्रकाशित खबरों को प्रभावित करने के लिए किया जा सकता है।

पत्रकारों के सूत्रों की गोपनीयता पर भी चिंता

खोजी पत्रकारिता में कई बार सूत्र अपनी पहचान गुप्त रखते हुए भ्रष्टाचार, कॉरपोरेट घोटालों या चुनावी गड़बड़ियों से जुड़े सबूत देते हैं। DNPA को आशंका है कि नए कानून के प्रावधान ऐसे सूत्रों की पहचान उजागर होने का खतरा बढ़ा सकते हैं।

याचिका में कहा गया है कि नियमों का पालन नहीं करने पर भारी जुर्माना लगाने के लिए एक प्राधिकरण बनाया जाएगा। इसके अलावा, कानून में सरकार को डेटा संभालने वाली संस्थाओं से जानकारी मांगने और कुछ जानकारियों को ब्लॉक करने की शक्ति देने का भी प्रावधान है।

DNPA का कहना है कि सरकार को मिली इन शक्तियों का दायरा स्पष्ट नहीं है। यदि सरकार किसी खबर से जुड़े सूत्र की जानकारी मांगती है, तो पत्रकारों पर उसकी पहचान बताने का दबाव पड़ सकता है। इससे उन व्हिसलब्लोअर्स को खतरा हो सकता है, जो भ्रष्टाचार और दूसरी गड़बड़ियों के सबूत सामने लाने में मदद करते हैं।

संगठन ने सरकार को मिली इन शक्तियों को दिशाहीन बताते हुए उन्हें रद्द करने की मांग की है। उसका तर्क है कि सरकार को कानून के तहत छूट मिली हुई है, लेकिन प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए पर्याप्त सुरक्षा नहीं दी गई है।

प्रेस की आजादी पर बहस के बीच मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा

Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक, यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब भारत में प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस चल रही है। आलोचक और विपक्षी दल आरोप लगाते रहे हैं कि 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से भारत में प्रेस की आजादी कमजोर हुई है।

रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स के World Press Freedom Index में भारत इस साल 180 देशों में 157वें स्थान पर है। वर्ष 2014 में भारत की रैंकिंग 140 थी। हालांकि, मोदी सरकार इस सूचकांक की आलोचना करती रही है। सरकार का कहना है कि भारत को अपनी प्रेस की आजादी का प्रमाण किसी विदेशी संस्था से लेने की जरूरत नहीं है।

इस मामले का राजनीतिक पहलू भी अहम है। विपक्ष लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि मोदी सरकार की नीतियों और कानूनों से गौतम अडानी और मुकेश अंबानी जैसे उद्योगपतियों को फायदा पहुंचता है। लेकिन अब अंबानी और अडानी से जुड़े मीडिया संस्थान भी सरकार के कानून को चुनौती देने वालों में शामिल हैं।

कुल 21 मीडिया घरानों ने सुप्रीम कोर्ट में 698 पन्नों की याचिका दाखिल की है। अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होगी और सरकार अपना हलफनामा दाखिल करेगी।

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