महर्षि वाल्मीकि की रामायण भारतीय संस्कृति और मानवीय मूल्यों की अमूल्य धरोहर: प्रो. हरिशंकर मिश्र
Siddharthnagar News: महर्षि वाल्मीकि जयंती के अवसर पर अखिल भारतीय साहित्य परिषद, गोरक्ष प्रांत इकाई की ओर से सिद्धार्थ विश्वविद्यालय परिसर में ऑनलाइन संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में विद्वानों ने महर्षि वाल्मीकि के साहित्यिक योगदान, रामायण के आदर्शों तथा भारतीय संस्कृति और मानवीय मूल्यों की वर्तमान समय में प्रासंगिकता पर विस्तार से विचार व्यक्त किए।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व आचार्य एवं प्रख्यात साहित्यकार प्रो. हरिशंकर मिश्र ने महर्षि वाल्मीकि को भारतीय साहित्यिक परंपरा का आदिकवि बताते हुए कहा कि रामायण केवल एक महाकाव्य या धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि भारतीय समाज की नैतिक चेतना, आदर्श जीवन-दृष्टि और मानवीय मूल्यों का महत्वपूर्ण आधार है।
उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम का चरित्र मर्यादा, कर्तव्यपालन, त्याग और आदर्श आचरण की प्रेरणा देता है। वहीं, जटायु, निषादराज और अहल्या जैसे पात्रों के माध्यम से महर्षि वाल्मीकि ने करुणा, सामाजिक समरसता, मानवीय गरिमा और संवेदनशीलता का संदेश दिया है। उन्होंने रामायण के विभिन्न प्रसंगों का उल्लेख करते हुए नैतिकता, उदारता और मर्यादित आचरण के महत्व को रेखांकित किया।
प्रो. मिश्र ने रामायण में वर्णित वन-जीवन और प्रकृति के विविध रूपों की चर्चा करते हुए कहा कि यह महाकाव्य मनुष्य और प्रकृति के सह-अस्तित्व तथा समस्त जीव-जगत के प्रति संवेदना की सीख भी देता है। उन्होंने बताया कि महर्षि वाल्मीकि की रामायण ने गोस्वामी तुलसीदास सहित अनेक साहित्यकारों और विभिन्न भारतीय भाषाओं में रचित रामकथाओं को गहराई से प्रभावित किया है।
उन्होंने कहा कि रामायण के आदर्श किसी एक काल या समाज तक सीमित नहीं हैं। आज भी ये आदर्श व्यक्ति, परिवार और समाज को नैतिकता, सहिष्णुता, कर्तव्यबोध और सामाजिक सद्भाव की दिशा प्रदान करते हैं। उन्होंने भारतीय साहित्य एवं ज्ञान-परंपरा का अध्ययन करने और रामायण के मूल संदेशों को जीवन में अपनाने पर बल दिया।
आधुनिक विज्ञान के साथ भारतीय संस्कृति से जुड़े रहें युवा: प्रो. हरीशकुमार शर्मा
संगोष्ठी की अध्यक्षता सिद्धार्थ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के आचार्य प्रो. हरीशकुमार शर्मा ने की। उन्होंने कहा कि महर्षि वाल्मीकि, महर्षि वेदव्यास और महाकवि कालिदास जैसे महान रचनाकारों ने अपनी साहित्यिक कृतियों के माध्यम से भारतीय संस्कृति और जीवन-मूल्यों को संरक्षित एवं समृद्ध किया है।
उन्होंने कहा कि रामायण भारतीय सांस्कृतिक चेतना का आधारभूत ग्रंथ है। विभिन्न भाषाओं में विकसित रामकथा परंपराएं इसकी व्यापकता और सार्वभौमिकता को दर्शाती हैं। कंबन सहित अनेक रचनाकारों ने रामकथा को अपने-अपने भाषाई और सांस्कृतिक परिवेश में प्रस्तुत कर इसकी समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाया है।
प्रो. शर्मा ने कहा कि वर्तमान समय में युवाओं के लिए आधुनिक विज्ञान और तकनीकी ज्ञान अर्जित करने के साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों तथा भारतीय ज्ञान-परंपरा से जुड़े रहना भी आवश्यक है। रामचरितमानस, महाभारत, श्रीमद्भगवद्गीता, वेद और उपनिषद जैसे ग्रंथ मानवता, संवेदनशीलता, सेवा, सहानुभूति और कर्तव्यपालन की प्रेरणा देते हैं।
उन्होंने कहा कि भारत को वैश्विक स्तर पर नेतृत्वकारी भूमिका निभाने के लिए आधुनिक तकनीक और प्राचीन ज्ञान-परंपरा के बीच सार्थक समन्वय स्थापित करना होगा। साहित्य और सांस्कृतिक विरासत का अध्ययन युवाओं में मानवीय दृष्टिकोण विकसित करने के साथ समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना को भी मजबूत करता है।
साहित्यकारों और शिक्षाविदों ने ऑनलाइन माध्यम से की सहभागिता
संगोष्ठी में अखिल भारतीय साहित्य परिषद, गोरक्ष प्रांत के उपाध्यक्ष एवं दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के आचार्य प्रो. प्रत्यूष कुमार दुबे उपस्थित रहे। परिषद के महामंत्री एवं लाल बहादुर शास्त्री महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. राम पाण्डेय ने स्वागत वक्तव्य दिया, जबकि परिषद के सहमंत्री एवं सिद्धार्थ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में सहायक आचार्य डॉ. जय सिंह यादव ने कार्यक्रम का संचालन किया।
सिद्धार्थ विश्वविद्यालय से प्रो. सत्येंद्र कुमार दुबे, डॉ. सच्चिदानंद चौबे, डॉ. हृदयकांत पांडेय, डॉ. दिनेश प्रसाद, डॉ. यशवंत यादव और डॉ. अविनाश प्रताप सिंह सहित अनेक शिक्षक, शोधार्थी, विद्यार्थी तथा अखिल भारतीय साहित्य परिषद से जुड़े साहित्यप्रेमी ऑनलाइन माध्यम से कार्यक्रम में शामिल हुए।
संगोष्ठी के दौरान महर्षि वाल्मीकि के साहित्यिक अवदान, भारतीय ज्ञान-परंपरा और समकालीन समाज में रामायण की प्रासंगिकता पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया। वक्ताओं ने साहित्य को मानवीय संवेदनाओं, नैतिक मूल्यों और सामाजिक समरसता को मजबूत करने का प्रभावी माध्यम बताया। यह जानकारी अखिल भारतीय साहित्य परिषद, गोरक्ष प्रांत के अध्यक्ष प्रो. हरीशकुमार शर्मा ने दी।
रिपोर्ट- जाकिर खान
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