शिवपाल की जगह अखिलेश बने लोहिया ट्रस्ट के अध्यक्ष, 9 साल बाद क्यों बदला समीकरण?

Lucknow News: समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) में संगठन और परिवार से जुड़ा एक और बड़ा बदलाव सामने आया है। करीब 9 साल बाद लोहिया ट्रस्ट (Lohia Trust) की कमान शिवपाल सिंह यादव (Shivpal Singh Yadav) से हटकर अब सपा प्रमुख अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) के हाथों में आ गई है। ट्रस्ट की बैठक में मौजूद सभी 8 सदस्यों ने अखिलेश को अध्यक्ष बनाए जाने पर सहमति जताई।

खास बात यह रही कि बैठक में शिवपाल यादव भी मौजूद थे। यानी जिस ट्रस्ट को लंबे समय तक शिवपाल के प्रभाव का अहम केंद्र माना जाता रहा, उसकी जिम्मेदारी अब अखिलेश के पास आ गई है।

2017 में शिवपाल को मिली थी जिम्मेदारी

लोहिया ट्रस्ट में अखिलेश यादव के अलावा शिवपाल यादव, दीपक मिश्रा, आदित्य यादव, राम नरेश यादव (इटावा), रामसेवक यादव, वीरपाल यादव (बरेली) और राजेश यादव सदस्य हैं। इनमें कई सदस्य शिवपाल के करीबी माने जाते हैं।

दरअसल, 2017 में समाजवादी परिवार (Samajwadi Family) के भीतर वर्चस्व की लड़ाई के दौरान तत्कालीन सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव (Mulayam Singh Yadav) ने प्रोफेसर रामगोपाल यादव को ट्रस्ट से हटाकर इसकी जिम्मेदारी शिवपाल यादव को सौंप दी थी। इसके बाद करीब नौ साल तक शिवपाल ही लोहिया ट्रस्ट के अध्यक्ष रहे।

अब Akhilesh Yadav के पास 3 बड़ी जिम्मेदारियां

लोहिया ट्रस्ट की कमान मिलने के बाद अखिलेश यादव के पास अब समाजवादी पार्टी के साथ-साथ जनेश्वर मिश्र ट्रस्ट और लोहिया ट्रस्ट, दोनों की जिम्मेदारी है। ऐसे में यह बदलाव केवल अध्यक्ष पद बदलने तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि सपा में अखिलेश के मजबूत होते नेतृत्व का संकेत भी माना जा रहा है।

लोहिया ट्रस्ट का गठन समाजवादी पार्टी से पहले हुआ था। इसका मुख्य उद्देश्य डॉ. राम मनोहर लोहिया (Ram Manohar Lohia) के विचारों और समाजवादी विचारधारा का प्रचार-प्रसार करना रहा है। ट्रस्ट की गतिविधियां समाजवादी विचारधारा से जुड़े कार्यक्रमों के साथ संसाधन जुटाने से भी जुड़ी रही हैं।

शिवपाल की जगह Akhilesh Yadav क्यों?

ट्रस्ट की ओर से अभी इस बदलाव की कोई विस्तृत राजनीतिक वजह नहीं बताई गई है। हालांकि, 2017 से 2026 तक बदले सियासी समीकरण इस फैसले को खास बनाते हैं। 2017 में जहां लोहिया ट्रस्ट शिवपाल के प्रभाव का प्रमुख केंद्र बना था, वहीं अब उसी ट्रस्ट की कमान अखिलेश के पास आ गई है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस फैसले पर शिवपाल समेत सभी 8 सदस्यों की सहमति रही। इसलिए इसे परिवार के भीतर नए टकराव के बजाय अखिलेश के नेतृत्व को स्वीकार किए जाने के संकेत के तौर पर भी देखा जा रहा है। 2017 के बाद सपा परिवार में जो सत्ता-संतुलन बना था, 2026 का यह फैसला उसमें एक और बड़े बदलाव की तस्वीर पेश करता है।

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