जज के साथ अन्याय हो तो वह कहां जाएं? मुजफ्फरनगर के जज रवि दिवाकर ने फैसले में उठाए सवाल
UP News: मुजफ्फरनगर के विशेष न्यायाधीश एनडीपीएस एक्ट/अपर सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने एक फैसले में न्यायिक प्रशासन से जुड़े कई अहम सवाल उठाए हैं। उन्होंने पूछा कि अगर किसी न्यायाधीश के साथ अन्याय हो तो वह कहां जाए? साथ ही सवाल किया कि सेशन जज या जिला जज का कोई प्रशासनिक आदेश कानून के खिलाफ और ‘विदाउट ज्यूरिस्डिक्शन’ हो तो क्या अधिकारी उसे मानने के लिए कानूनी रूप से बाध्य है?
रवि दिवाकर ने गुरुवार को यह टिप्पणी 2015 के एक चरस बरामदगी मामले में फैसला सुनाते हुए की। बताया गया है कि पिछले पांच महीने में वह 23 लोगों को फांसी की सजा सुना चुके हैं और उनसे 100 से ज्यादा मामले वापस लिए गए हैं।
पार्ट-हर्ड मामलों की फाइल वापस लेने पर सवाल
फैसले में 18 अगस्त 2026 के प्रशासनिक आदेश का जिक्र किया गया। जज ने कहा कि गंभीर मामलों की पत्रावली अगर किसी अदालत से प्रशासनिक स्तर पर वापस ली जाती है या दूसरी अदालत में भेजी जाती है तो इसके कारण रिकॉर्ड में स्पष्ट होने चाहिए। संबंधित फाइलें तत्कालीन जिला एवं सत्र न्यायाधीश के आदेश पर रिकॉल की गई थीं, लेकिन आदेश में कारण दर्ज नहीं था।
उन्होंने कहा कि सिर्फ शक्ति होना पर्याप्त नहीं है। प्रशासनिक आदेश कारणयुक्त होने चाहिए। पारदर्शिता, जिम्मेदारी और जवाबदेही जरूरी है। उन्होंने यह भी कहा कि लोक सेवक में सही को सही और गलत को गलत कहने की क्षमता होनी चाहिए।
150 ग्राम चरस के मामले में आरोपी दोषमुक्त
नई मंडी थाने में 21 अक्टूबर 2015 को अशोक भारती के खिलाफ करीब 150 ग्राम चरस मिलने का मुकदमा दर्ज हुआ था। पुलिस ने उसके खिलाफ धारा 8/20 एनडीपीएस एक्ट में केस दर्ज किया था। चार गवाहों और दस्तावेजी साक्ष्यों की सुनवाई के बाद अदालत ने कहा कि आरोप युक्तियुक्त संदेह से परे साबित होना जरूरी है। साक्ष्यों की जांच के बाद अशोक भारती को दोषमुक्त कर दिया गया।
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