कानपुर में साइबर ठगों ने 272 लोगों से उड़ाए 100 करोड़ रुपये, बैंकों की भूमिका पर उठे सवाल
Kanpur News: कानपुर में साइबर ठगी के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। पुलिस, साइबर सेल और सरकारी व गैर सरकारी संस्थाओं के जागरूकता अभियान के बावजूद साइबर अपराधी लोगों को अपना निशाना बना रहे हैं। ठगी की रकम वापस दिलाने में बैंकों की भूमिका और उनकी जवाबदेही भी सवालों के घेरे में है।
आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी से 20 अक्टूबर 2026 के बीच कानपुर में साइबर ठगी के 272 मामले दर्ज हुए। इन मामलों में लोगों से कुल 100 करोड़ 9 लाख 24 हजार 55 रुपये की ठगी की गई। यानी औसतन हर दिन करीब 33.15 लाख रुपये की डिजिटल ठगी हुई।
पुलिस और साइबर सेल ने कार्रवाई करते हुए 151 आरोपियों को गिरफ्तार किया है। हालांकि, चारों जोन की साइबर सेल अब तक ठगी की रकम का बहुत छोटा हिस्सा ही फ्रीज करा सकी है। एक अधिकारी के मुताबिक, बैंकों को जवाबदेह बनाने से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद पीड़ितों को अपनी रकम वापस मिलने की उम्मीद बढ़ सकती है।
दो साल में 5,459 खाते फ्रीज, डिजिटल अरेस्ट के मामलों में आई कमी
साइबर ठगी की रकम को इधर-उधर भेजने के लिए अपराधी म्यूल खातों का इस्तेमाल करते हैं। ये खाते बेरोजगारों, छात्रों, ग्रामीणों और जरूरतमंद लोगों को लालच देकर खुलवाए जाते हैं। इसके बाद उनसे एटीएम कार्ड, पासबुक और चेकबुक भी ले ली जाती है। कई मामलों में ठग इन खातों को किराये पर भी लेते हैं।
साइबर सेल के एक अधिकारी के अनुसार, ठगी में इस्तेमाल होने वाले पहले और दूसरे स्तर के खातों को फ्रीज कराया जाता है। जनवरी 2025 से अक्टूबर 2026 तक कुल 5,459 खाते फ्रीज कराए गए हैं।
डिजिटल अरेस्ट के मामलों में भी इस साल कमी दर्ज की गई है। वर्ष 2025 में ऐसे 17 से ज्यादा मामले सामने आए थे। वहीं, जनवरी से अक्टूबर 2026 तक सात मामले दर्ज हुए। इन मामलों में 13 लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है।
कानपुर में साइबर अपराध के आंकड़े
| विवरण | वर्ष 2026 (20 अक्टूबर तक) | वर्ष 2025 |
| साइबर ठगी के दर्ज मामले | 272 | 429 |
| गिरफ्तार आरोपी | 151 | 104 |
| चार्जशीट दाखिल मामले | 85 | 102 |
| ठगी की कुल रकम | 100 करोड़ 9 लाख 24 हजार 55 रुपये | 41 करोड़ 97 लाख 10 हजार 240 रुपये |
| फ्रीज कराई गई रकम | 1 करोड़ 85 लाख 59 हजार 835 रुपये* | 1 करोड़ 85 लाख 59 हजार 835 रुपये* |
करोड़ों की ठगी के बाद पीड़ितों ने बैंकों पर उठाए सवाल
कानपुर के डिफेंस कॉलोनी, जाजमऊ निवासी मोहम्मद अहमद लारी सेफ्टी सूट और हॉर्स जीन के निर्यातक हैं। उनके मुताबिक, फेसबुक के जरिए फिनसोल प्राइवेट लिमिटेड में ज्यादा मुनाफा दिलाने का दावा कर अनन्या कुलकर्णी नाम की महिला ने उनसे संपर्क किया।
अहमद ने बताया कि दो महीने के दौरान उनसे कई बार में कुल 2.66 करोड़ रुपये निवेश कराए गए। जब उन्होंने बढ़कर हुई रकम 9,74,81,459.78 रुपये निकालने की कोशिश की, तो उनसे 30 लाख रुपये और मांगे गए। इसके बाद उन्होंने अपने चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) से जांच कराई। तब उन्हें ठगी का पता चला।
साइबर सेल ने इस मामले में मुकदमा दर्ज कर 30 लाख रुपये होल्ड करा दिए। अहमद का आरोप है कि ठगी के बाद बैंकों की ओर से उन्हें कोई उचित मदद नहीं मिली।
इसी तरह हरवंश मोहाल निवासी शिवा साहू को शेयर ट्रेडिंग में ज्यादा मुनाफे का लालच देकर 23.16 लाख रुपये की ठगी का शिकार बनाया गया। शिवा के मुताबिक, 14 अगस्त को अदिति जाधव नाम की महिला ने उनसे व्हाट्सएप पर संपर्क किया। उसने शेयर ट्रेडिंग में मुनाफे का भरोसा देकर एक ऐप डाउनलोड कराया।
शिवा ने बताया कि 15 सितंबर से 8 अक्टूबर 2026 के बीच उनसे 23.16 लाख रुपये अलग-अलग लेन-देन के जरिए ट्रांसफर करा लिए गए। साइबर सेल को सूचना देने के बाद उन्होंने बैंक में भी शिकायत की, लेकिन बैंक अधिकारियों ने मदद करने से इनकार कर दिया। उनका कहना है कि बैंक ने नियमों और दूसरे प्रावधानों का हवाला देकर उन्हें पुलिस के पास भेज दिया।
सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश पर शिवा ने उम्मीद जताई कि अगर बैंक जवाबदेह होंगे तो साइबर ठगी की घटनाओं पर काफी हद तक रोक लग सकेगी।
साइबर ठगी में बैंक कब लौटाएगा पैसा?
बैंक ऑफ इंडिया ऑफिसर्स ऑर्गनाइजेशन के प्रदेश महामंत्री अंकित अवस्थी के मुताबिक, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नियमों के तहत अनधिकृत इलेक्ट्रॉनिक लेन-देन में ग्राहक की जिम्मेदारी इस बात पर निर्भर करती है कि ठगी किन परिस्थितियों में हुई।
अगर धोखाधड़ी बैंक की गलती या लापरवाही से हुई है, तो ग्राहक की जिम्मेदारी नहीं बनती। वहीं, अगर ग्राहक ने अपनी भुगतान संबंधी जानकारी किसी दूसरे व्यक्ति के साथ साझा की है, तो बैंक को सूचना देने से पहले हुए नुकसान की जिम्मेदारी ग्राहक पर आ सकती है।
अगर कोई व्यक्ति खुद ठग के कहने पर यूपीआई से भुगतान करता है या रकम ट्रांसफर करता है, तो उसे अपने आप रिफंड मिलने की गारंटी नहीं होती। ऐसे मामलों में लेन-देन की परिस्थितियों और बैंक की जांच के आधार पर फैसला किया जाता है।
अंकित अवस्थी के अनुसार, साइबर ठगी का शिकार होने पर पीड़ित को लेन-देन से जुड़े मैसेज और शिकायत संख्या सुरक्षित रखनी चाहिए। बैंक और संबंधित एजेंसियों को समय पर सूचना देने से रकम को रोकने और नुकसान की भरपाई की संभावना बेहतर हो सकती है।

