दुनिया की संसदों में कितनी है मुस्लिम सांसदों की संख्या, भारत समेत प्रमुख देशों का जानें आंकड़ा
Sandesh Wahak Digital Desk: अमेरिकी मिडटर्म चुनाव के हालिया नतीजों में जहां रिपब्लिकन पार्टी की राजनीतिक स्थिति चर्चा में रही, वहीं 7 मुस्लिम उम्मीदवारों की सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में जीत ने भी वैश्विक ध्यान खींचा है। इनमें सीनेट का चुनाव जीतने वाले अब्दुल सईद का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। अमेरिका की 535 सीटों वाली संसद में इन 7 मुस्लिम सांसदों की जीत के साथ उनकी कुल हिस्सेदारी लगभग 1.3 प्रतिशत हो गई है।
यदि वैश्विक परिदृश्य में अन्य देशों की संसदों और वहां मुस्लिम सांसदों की हिस्सेदारी की तुलना की जाए, तो आंकड़े इस प्रकार हैं।
भारत: लोकसभा (543 सीटें) में 24 और राज्यसभा (245 सीटें) में 12 मुस्लिम सांसद हैं। कुल भारतीय संसद में यह हिस्सेदारी करीब 4.6% है।
ब्रिटेन: 2024 के हाउस ऑफ कॉमन्स (650 सीटें) चुनावों में 25 मुस्लिम सांसद चुने गए, जो कुल सीटों का 3.89% है।
फ्रांस: निचली सदन की 577 सीटों में से 19 मुस्लिम सांसद हैं, जो 3.30% हिस्सेदारी दर्शाते हैं।
इजराइल: 120 सीटों वाली नेसेट में 19 मुस्लिम सांसदों ने जीत दर्ज की है, जो करीब 15.8% बैठता है।
कनाडा: 343 सीटों वाले हाउस ऑफ कॉमन्स में 13 मुस्लिम सांसद चुने गए हैं, जो लगभग 3.79% है।
आबादी के मुकाबले क्यों पीछे है राजनीतिक हिस्सेदारी
विभिन्न लोकतांत्रिक देशों में मुस्लिम आबादी और संसद में उनकी मौजूदगी के आंकड़ों के बीच एक बड़ा अंतर देखने को मिलता है। कई देशों में यह मुद्दा समय-समय पर बहस का केंद्र बनता रहा है।
| देश | मुस्लिम आबादी (अनुमानित %) | संसद में प्रतिनिधित्व (%) |
| अमेरिका | 1.9% | ~1.3% |
| कनाडा | 4.6% | ~3.79% |
| ब्रिटेन | 6.0% | ~3.89% |
| फ्रांस | 9.0% | ~3.30% |
| इजराइल | 18.0% | ~15.8% |
| भारत | ~20.0% | ~4.6% |
संसदों में क्यों घट रही है हिस्सेदारी
किसी भी लोकतांत्रिक प्रणाली में संसद का मुख्य कार्य कानून बनाना और देश के सभी वर्गों का संतुलित प्रतिनिधित्व करना होता है। 2021 में प्रकाशित कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के एक शोध पत्र के अनुसार, संसदों में अल्पसंख्यकों/मुसलमानों की घटती भागीदारी के पीछे तीन प्राथमिक कारण बताए गए हैं।
टिकट वितरण में विविधता की अनदेखी: मुख्यधारा के राजनीतिक दल जिताऊ उम्मीदवार पर अधिक ध्यान केंद्रित करते हैं और मुस्लिम प्रत्याशियों को टिकट देने में हिचकिचाते हैं।
संवैधानिक और संस्थागत प्रावधानों की कमी: अधिकांश लोकतांत्रिक प्रणालियों में जहां मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं, वहां राजनीतिक व्यवस्था के भीतर उनके प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के विशेष प्रावधान नहीं हैं।
वैश्विक स्तर पर दक्षिणपंथ का उभार: दुनिया भर की राजनीति में दक्षिणपंथी विचारधारा के बढ़ते प्रभाव के कारण भी अल्पसंख्यकों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का दायरा सिमटा है।
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