बलरामपुर की प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था वेंटिलेटर पर, 151 उप-स्वास्थ्य केंद्र अधूरे, ग्रामीण सुविधाओं से वंचित
Sandesh Wahak Digital Desk: उत्तर प्रदेश के आठ अति महत्वाकांक्षी जिलों में शामिल बलरामपुर में विकास की नई गाथाएं लिखने के सरकारी दावों के बावजूद, ज़िले की स्वास्थ्य व्यवस्था लगातार चरमराई हुई है। जबकि सरकार की प्राथमिकताओं में स्वास्थ्य सेवाएं को बेहतर करना है। उप-स्वास्थ्य केंद्रों या आयुष्मान आरोग्य मंदिरों की स्थिति बदहाल है। कहीं, भवन बन तो गए हैं, पर सुविधाओं के अभाव या स्टाफ की कमी के कारण उनका संचालन नहीं हो पा रहा है, जिससे ग्रामीण मूलभूत स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित हैं।

आंकड़े बता रहे हैं बदहाली की कहानी
आवश्यकता बनाम संचालन: ज़िले में कुल 387 उप-स्वास्थ्य केंद्रों की आवश्यकता है, लेकिन फ़िलहाल केवल 336 ही संचालित हो रहे हैं।
किराए के भवन पर निर्भरता: इन संचालित केंद्रों में से 121 उप-स्वास्थ्य केंद्र अभी भी किराए के भवनों में चल रहे हैं।
अधूरे भवन: चौंकाने वाली बात यह है कि 151 नए बने केंद्र ऐसे हैं जिनका आज तक स्वास्थ्य विभाग को उपभोग प्रमाण पत्र तक नहीं मिल पाया है। ये भवन बनकर खड़े हैं, पर उपयोग में नहीं आ रहे हैं।
एएनएम की तैनाती: कुल 343 केंद्र ऐसे हैं, जहां एएनएम सेंटर सुचारु रूप से चल रहे हैं, और इन्हीं पर स्टाफ की तैनाती है। इसके साथ कई आयुष्मान आरोग्य मंदिर हैं, जहां पर कम्युनिटी हेल्थ ऑफिसर तो तैनात हैं। लेकिन सुविधाओं की कमी के कारण इलाज संभव नहीं हो पा रहा है।

भवन होने के बावजूद किराए पर काम
ज़मीनी हकीकत और भी भयावह है। रिपोर्ट के अनुसार, बिनहोनी कला में उप-स्वास्थ्य केंद्र का भवन तो बन गया है, लेकिन मूलभूत सुविधाओं की कमी और कार्यदाई संस्था से हैंडओवर ना हो पाने के कारण वहाँ तैनात एएनएम को एक किराए के भवन में जाकर काम करना पड़ रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि नए भवनों में न तो टीकाकरण सत्र सही से चल पाता है, न ही धात्री महिलाओं और आम लोगों के लिए बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्थाएँ उपलब्ध हैं।
नाम बदलने से नहीं बदलेगी व्यवस्था
ग्रामीणों का कहना है कि उप-स्वास्थ्य केंद्रों का नाम बदलकर ‘आरोग्य मंदिर’ रख देने से व्यवस्थाओं में परिवर्तन नहीं होगा। व्यवस्था में सुधार लाने के लिए तमाम चीजों को ज़मीन पर उतारना और अधूरे पड़े भवनों को तुरंत चालू करना जरूरी है।
फ़िलहाल, बलरामपुर में 387 में से 343 ही संचालित हो रहे हैं, जिससे ‘एस्पिरेशनल डिस्ट्रिक्ट’ की स्वास्थ्य सेवाओं पर बड़ा सवाल खड़ा होता है। अब देखना यह होगा कि इस मामले पर ज़िला और राज्य प्रशासन क्या कदम उठाते हैं। यह तब और भी बड़ा हो जाता है, जब बलरामपुर जिले की वजह से स्वास्थ्य सेवाओं के डाटा में प्रदेश, देश की रैंकिंग में पिछड़ जाता है। वहीं इस मामले पर जब सीएमओ मुकेश रस्तोगी को उनके बयान के लिए फोन किया तो उन्होंने फोन नहीं उठाया।
रिपोर्ट: योगेंद्र त्रिपाठी
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