काशी से ‘गो प्रतिष्ठा यात्रा’ का आगाज: 6 जिलों से होते हुए 11 मार्च को लखनऊ पहुंचेंगे शंकराचार्य

Sandesh Wahak Digital Desk: काशी की पुण्यधरा से ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने ‘गो प्रतिष्ठा धर्मयुद्ध यात्रा’ का आधिकारिक शंखनाद कर दिया है। शुक्रवार को केदारघाट पर मां गंगा के विधिवत पूजन और छत्रपति शिवाजी महाराज को नमन करने के साथ इस यात्रा की शुरुआत हुई। शनिवार सुबह संकटमोचन और श्रीचिंतामणि गणेश मंदिर में दर्शन के पश्चात शंकराचार्य का काफिला लखनऊ की ओर कूच करेगा।

यात्रा का मार्ग और उद्देश्य

शंकराचार्य अगले चार दिनों में उत्तर प्रदेश के 6 जिलों का भ्रमण करेंगे और दर्जनभर से अधिक स्थानों पर जनसभाओं को संबोधित करेंगे।

  • रूट: वाराणसी- जौनपुर-सुल्तानपुर -रायबरेली-उन्नाव-लखीमपुर खीरी-लखनऊ (11 मार्च)।

  • मुख्य मांग: उत्तर प्रदेश सरकार आगामी 40 दिनों के भीतर गोमाता को ‘राज्यमाता’ घोषित करे और प्रदेश में गो-हत्या पर पूर्णतः प्रतिबंध लगाए।

  • अल्टीमेटम: शंकराचार्य ने बताया कि शिवाजी महाराज की जयंती तक सरकार को दिया गया 35 दिनों का समय पूरा हो चुका है, लेकिन कोई ठोस कदम न उठाए जाने के कारण अब उन्होंने ‘धर्मयुद्ध’ का मार्ग चुना है।

शिवाजी महाराज और शास्त्रों का उद्घोष

केदारघाट पर आयोजित कार्यक्रम में शंकराचार्य ने छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन प्रसंगों का उल्लेख करते हुए गंभीर संदेश दिए।

  1. ऐतिहासिक संदर्भ: शिवाजी महाराज ने मात्र 12 वर्ष की आयु में एक गो-हत्यारे को दंडित कर गोरक्षा का संकल्प लिया था।

  2. शास्त्रीय विवेचना: उन्होंने ‘बुधभूषण’ ग्रंथ का हवाला देते हुए कहा कि जो क्षत्रिय गाय, ब्राह्मण और मंदिरों की रक्षा के लिए प्राण देता है, वही कीर्ति और स्वर्ग का अधिकारी है।

  3. छद्म हिंदुत्व पर प्रहार: शंकराचार्य ने कड़े शब्दों में कहा कि जो लोग गाय और मंदिरों को नष्ट करने का प्रयास कर रहे हैं, उनसे धर्मयुद्ध लड़कर ‘छद्म हिंदुओं’ को पहचानने का समय आ गया है।

सम्मान: प्रथम ‘करपात्र गोभक्त सम्मान’

अखिल भारतीय सारस्वत परिषद की ओर से शंकराचार्य को उनके गोरक्षा प्रयासों के लिए प्रथम ‘करपात्र गोभक्त सम्मान’ से विभूषित किया गया। संस्था के गिरीश चंद्र तिवारी और प्रो. विवेकानंद तिवारी ने उन्हें यह सम्मान प्रदान किया। घाट पर कलाकारों ने शिवाजी महाराज के जीवन पर आधारित एक भावपूर्ण लघु नाटिका की प्रस्तुति भी दी।

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