अखिलेश के फ्लॉप डिप्टी वाले तंज पर ब्रजेश पाठक का पलटवार, लोहिया की तस्वीर दिखा याद दिलाया इतिहास

Lucknow News: उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में इन दिनों तीखे बयानों और सोशल मीडिया पर शह-मात का खेल चरम पर है। सूबे के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक और समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के बीच जुबानी जंग अब बेहद आक्रामक मोड़ ले चुकी है। अखिलेश यादव द्वारा डिप्टी सीएम के एक वीडियो इंटरव्यू को लेकर कसे गए तंज पर पलटवार करते हुए ब्रजेश पाठक ने एक ऐतिहासिक तस्वीर साझा की है। इस तस्वीर के जरिए उन्होंने न केवल अखिलेश यादव को युवराज और झूठ का सौदागर करार दिया, बल्कि सपा के आदर्श डॉ. राममनोहर लोहिया का उदाहरण देकर पूर्व मुख्यमंत्री को आईना भी दिखाया है।

सरकार में नाकाम होकर इंटरव्यू-इंटरव्यू खेल रहे डिप्टी

इस पूरे सियासी घमासान की शुरुआत तब हुई जब सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर ब्रजेश पाठक का एक वीडियो क्लिप पोस्ट करते हुए उन पर तीखा व्यंग्य कसा था। अखिलेश ने लिखा था, जो स्वास्थ्य मंत्री के रूप में साबित हो गए बेकार, अब वो बन गए पत्रकार… क्योंकि समय बिताने के लिए करना है कुछ काम; सरकार, संगठन, दल में तो पहले ही हुए नाकाम। प्रदेश की जनता बिन-बिजली, गर्मी और बीमारी में तड़प रही है और भाजपाई मंत्री ‘इंटरव्यू-इंटरव्यू’ खेलकर छुट्टियाँ मना रहे हैं।

पंडित दीनदयाल और डॉ. लोहिया का दिया हवाला

अखिलेश के इस हमले का जवाब डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने बेहद रणनीतिक अंदाज में दिया। उन्होंने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर एक दुर्लभ ऐतिहासिक तस्वीर साझा की, जिसमें पंडित दीनदयाल उपाध्याय, स्व. पीतांबर दास, राष्ट्र ऋषि नानाजी देशमुख और महान समाजवादी विचारक डॉ. राममनोहर लोहिया आपस में संवाद करते नजर आ रहे हैं।

तस्वीर के साथ ब्रजेश पाठक ने लिखा, पत्रकार होना गर्व की बात है। मैं तो एक साधारण राजनीतिक कार्यकर्ता हूं, लेकिन हमारा गौरवशाली इतिहास गवाह है कि डॉ. राममनोहर लोहिया जी स्वयं हिंदी मासिक पत्रिका ‘जन’ और अंग्रेजी पत्रिका ‘मैनकाइंड’ के संपादक थे। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी भी ‘राष्ट्रधर्म’ पत्रिका निकालते थे।

तानाशाह ही संवाद के विरोधी होते हैं, मिर्ची लगे तो मैं क्या करूँ?

डिप्टी सीएम ने संवाद के महत्व को सनातन परंपरा से जोड़ते हुए ‘वादे वादे जायते तत्वबोध’ का श्लोक उद्धृत किया और लोकनायक जयप्रकाश नारायण (जेपी) के कथन का जिक्र करते हुए कहा कि तानाशाह ही संवाद के विरोधी होते हैं। पत्रकारों को ‘खलिहर’ बताने पर आपत्ति जताते हुए उन्होंने कहा, एक सार्थक साक्षात्कार में कितनी मेधा और मेहनत लगती है, यह हमारे पत्रकार साथियों से पूछिए। जो खुद ‘युवराज’ होंगे, उन्हें मेहनतकश लोग बुरे ही लगेंगे। उन्होंने अंत में साफ लहजे में कहा कि वह एक स्वास्थ्य मंत्री के रूप में लोकस्वास्थ्य को बेहतर कर रहे हैं और संवाद के जरिए अपना लोककर्त्तव्य निभा रहे हैं, अब इस पर किसी को मिर्ची लगे तो वह क्या करें।

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