मोदी सरकार के प्लान पर ब्रेक के संकेत, क्या टल जाएगा ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ बिल?

One Nation One Election Bill: केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ (एक देश, एक चुनाव) योजना को फिलहाल कुछ इंतजार करना पड़ सकता है। इस प्रस्ताव से जुड़े संविधान संशोधन विधेयकों की जांच कर रही संयुक्त संसदीय समिति (JPC) आगामी मॉनसून सत्र में अपनी रिपोर्ट शायद ही सौंप पाए। सूत्रों के अनुसार, समिति का देशभर में हितधारकों से परामर्श अभी पूरा नहीं हुआ है, इसलिए वह अपने कार्यकाल को बढ़ाने के लिए और समय मांग सकती है। लोकसभा पहले ही समिति का कार्यकाल मॉनसून सत्र के अंतिम दिन तक बढ़ा चुकी है।

JPC ने अब तक 10 राज्यों का किया दौरा

JPC में 39 सदस्य हैं और इसकी अध्यक्षता भाजपा सांसद पीपी चौधरी कर रहे हैं। समिति संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 की समीक्षा कर रही है। दिसंबर 2024 में पेश किए गए इन विधेयकों को आगे की जांच के लिए समिति को भेजा गया था। अब तक समिति 10 राज्यों का दौरा कर चुकी है और दिल्ली विधानसभा में भी हितधारकों से चर्चा करेगी, जबकि कई राज्यों में परामर्श अभी बाकी है।

2034 से पहले पूरे देश में एक साथ चुनाव मुश्किल 

समिति के अध्यक्ष ने संकेत दिए हैं कि सभी कानूनी प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद भी 2034 से पहले पूरे देश में एक साथ चुनाव होने की संभावना बेहद कम है। केंद्र सरकार का कहना है कि एक साथ चुनाव कराने से बार-बार चुनाव का खर्च कम होगा, आचार संहिता के कारण विकास कार्यों में रुकावट नहीं आएगी और सरकारें सुशासन पर अधिक ध्यान दे सकेंगी। वहीं विपक्ष का आरोप है कि इससे राज्यों के अधिकार और देश का संघीय ढांचा प्रभावित हो सकता है।

सूत्रों के मुताबिक, सरकार राजनीतिक समर्थन बढ़ाने के लिए परिसीमन विधेयक को भी इस प्रस्ताव के साथ जोड़ने की संभावना तलाश रही है। सरकार 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले महिला आरक्षण लागू करने के लिए परिसीमन विधेयक पारित कराना चाहती है।

‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ लागू करने के लिए संविधान में कई संशोधन करने होंगे। इसके लिए लोकसभा और राज्यसभा में विशेष बहुमत के साथ-साथ कम से कम 15 राज्यों की मंजूरी भी जरूरी होगी। मौजूदा समय में NDA के पास लगभग 293 से 318 लोकसभा सांसद और 141 से 153 राज्यसभा सदस्य हैं, जो आवश्यक दो-तिहाई बहुमत से अभी कम हैं। हालांकि, करीब 20 राज्यों में NDA या उसके सहयोगियों की सरकार होने के कारण राज्यों से मंजूरी मिलना अपेक्षाकृत आसान माना जा रहा है।

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