भारत को ऑस्ट्रेलिया से मिलेगा यूरेनियम, 2014 की न्यूक्लियर डील आखिरकार हुई लागू
India Australia Civil Nuclear Agreement: भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच लंबे समय से लंबित सिविल न्यूक्लियर एग्रीमेंट अब पूरी तरह लागू हो गया है। दोनों देशों ने इसके लिए जरूरी प्रशासनिक व्यवस्था को मंजूरी दे दी है, जिससे ऑस्ट्रेलिया से भारत को यूरेनियम की आपूर्ति का रास्ता साफ हो गया है। इस समझौते को भारत की स्वच्छ ऊर्जा योजनाओं और दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी के लिहाज से बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
हालांकि दोनों देशों ने इस परमाणु सहयोग समझौते पर वर्ष 2014 में हस्ताक्षर किए थे, लेकिन सुरक्षा मानकों, निगरानी व्यवस्था और तकनीकी प्रक्रियाओं को लेकर यह अब तक पूरी तरह लागू नहीं हो पाया था। पिछले दो वर्षों की विस्तृत बातचीत के बाद अब दोनों पक्ष इन प्रक्रियाओं पर सहमत हो गए हैं।
क्या बदलेगा और क्यों है यह समझौता अहम?
ऑस्ट्रेलिया दुनिया के सबसे बड़े यूरेनियम भंडार वाले देशों में शामिल है। नई व्यवस्था लागू होने के बाद ऑस्ट्रेलियाई यूरेनियम खनन कंपनियां और भारत के परमाणु ऊर्जा संस्थान सीधे व्यावसायिक आपूर्ति समझौते कर सकेंगे।
विदेश सचिव विक्रम मिस्री के अनुसार, यूरेनियम की पूरी सप्लाई अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के सुरक्षा मानकों के अनुरूप ट्रैक की जाएगी, ताकि इसका उपयोग केवल शांतिपूर्ण और नागरिक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रमों में ही हो।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि यह समझौता भारत के स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों को नई गति देगा। वहीं ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने इसे दोनों देशों के लिए “विन-विन” साझेदारी बताते हुए कहा कि इससे भारत की गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली क्षमता बढ़ेगी और ऑस्ट्रेलिया को यूरेनियम निर्यात के लिए बड़ा बाजार मिलेगा।
रक्षा और रणनीतिक साझेदारी भी हुई मजबूत
परमाणु सहयोग के अलावा भारत और ऑस्ट्रेलिया ने रक्षा, समुद्री सुरक्षा और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए 17 अन्य महत्वपूर्ण समझौतों पर भी सहमति जताई। इनमें रक्षा एवं सुरक्षा पर संयुक्त घोषणा, भारत-ऑस्ट्रेलिया समुद्री सुरक्षा सहयोग रोडमैप, सैन्य सूचनाओं के आदान-प्रदान, संयुक्त विमान तैनाती और रक्षा स्टार्टअप्स के बीच सहयोग जैसे अहम कदम शामिल हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ स्वच्छ ऊर्जा, परमाणु सहयोग और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी को भी नई मजबूती देगा।
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