नेपाल बाढ़ की चपेट में आए ईशा फाउंडेशन के 80 लोग, सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने व्यक्त किया गहरा दुख

Sandesh Wahak Digital Desk: तिब्बत और नेपाल की सीमा पर आई विनाशकारी बाढ़ और फ्लैश फ्लड (अचानक आई बाढ़) पर आध्यात्मिक गुरु व ईशा फाउंडेशन के संस्थापक सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने गहरा दुख व्यक्त करते हुए स्थिति को अत्यंत चिंताजनक बताया है। सद्गुरु ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक वीडियो संदेश जारी कर बताया कि उनके संगठन से जुड़े कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गए एस3 (S3) समूह के 80 लोग इस आपदा की चपेट में आ गए हैं।

इस समूह में 77 तीर्थयात्री और 3 स्वयंसेवक (जिनमें एक डॉक्टर भी शामिल थे) मौजूद थे। नेटवर्क ठप होने और रास्ते बंद होने के कारण उनसे संपर्क पूरी तरह टूट गया है। सद्गुरु ने बताया कि वे प्रभावित क्षेत्र तक पहुंचने और राहत कार्य शुरू कराने के लिए भारतीय, चीनी और अमेरिकी दूतावासों से लगातार अनुमति लेने का प्रयास कर रहे हैं।

सद्गुरु के अनुसार, वापसी के दौरान बुधवार सुबह करीब 9:05 बजे समूह के लीडर ने इमिग्रेशन सेंटर पहुंचने का संदेश भेजा था, लेकिन महज 9 मिनट बाद (सुबह 9:14 बजे) यह भीषण प्राकृतिक आपदा आ गई। बाढ़ और मलबे का बहाव इतना तेज था कि शहर का एक बड़ा हिस्सा, इमारतें और नया बना पुल ताश के पत्तों की तरह बह गए। लापता 80 लोगों के दल में 34 पुरुष और 46 महिलाएं शामिल हैं, जो विश्व के 20 विभिन्न देशों से आए थे। इनमें अमेरिका से 22, कनाडा से 12, ऑस्ट्रेलिया से 11, ब्रिटेन से 9, जर्मनी से 4, फ्रांस से 3, नेपाल से 3 तथा नीदरलैंड, न्यूजीलैंड, सिंगापुर और स्पेन से 2-2 लोग शामिल हैं। इसके अलावा फिनलैंड, हंगरी, इजराइल, लिथुआनिया, फिलीपींस, पुर्तगाल, रूस और दक्षिण अफ्रीका से भी 1-1 नागरिक इस समूह में था।

मृतकों की संख्या 160 के पार

आपदा के कारणों को लेकर शुरुआती दौर में भूकंप की आशंका जताई गई थी, लेकिन वैज्ञानिक विश्लेषण के अनुसार हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर टूटने अथवा बर्फ और चट्टान का बहुत बड़ा हिस्सा खिसकने (लैंडस्लाइड) से नदी में अचानक पानी और मलबे का भारी सैलाब आ गया।

अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के मुताबिक नेपाल और तिब्बत दोनों ही क्षेत्रों को मिलाकर मृतकों की संख्या 160 से अधिक हो चुकी है, जबकि सैकड़ों लोग अब भी लापता हैं। स्थानीय नेपाली गाइडों के परिवार भी प्रभावित क्षेत्र में रहते हैं, जिससे संकट और गहरा गया है। सड़कें टूटने और टेलीकम्युनिकेशन पूरी तरह ठप होने के कारण राहत व बचाव दलों के सामने गंभीर चुनौतियां बनी हुई हैं।

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