ग्लेशियर ढहने और भूकंप ने लाई नेपाल में विनाशकारी बाढ़, ISRO ने जारी की तस्वीर
Sandesh Wahak Digital Desk: नेपाल के रसुवा क्षेत्र में आई भीषण फ्लैश फ्लड ने पूरे हिमालयी इलाके को हिलाकर रख दिया है। अब तक 160 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है, जबकि 750 लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं। इनमें 133 भारतीय नागरिक भी शामिल हैं। बुधवार दोपहर से सोशल मीडिया पर जो तस्वीरें और वीडियो सामने आए हैं, वे बेहद डरावने हैं पुल, होटल, सड़कें और टॉवर सब कुछ पानी के उफान में बहता नज़र आ रहा है। इस तबाही की वजह जानने के लिए ISRO की प्रमुख इकाई NRSC ने उपग्रहों से मिली तस्वीरों के आधार पर शुरुआती शोध किया है। भारतीय और अंतरराष्ट्रीय सैटेलाइट्स की मदद से वैज्ञानिकों ने इस आपदा के पैमाने और कारणों को समझने की कोशिश की है।
4.9 तीव्रता के झटके ने किया ग्लेशियर को कमजोर
भारतीय भूकंप निगरानी नेटवर्क ने बुधवार सुबह 8:22 बजे (भारतीय समय) 4.9 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया, जिसका केंद्र रसुवा क्षेत्र के पास था। NRSC के वैज्ञानिकों के अनुसार, इस झटके ने तिब्बत के ऊँचे पहाड़ी इलाके में मौजूद एक सर्क ग्लेशियर को अस्थिर कर दिया। भूकंप के तुरंत बाद ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा ढह गया, जिससे बर्फ और चट्टानों का विशाल हिमस्खलन शुरू हो गया। यह हिमस्खलन तेज़ी से घाटी में उतरा और अपने साथ भारी मात्रा में पानी, मिट्टी, पत्थर और मलबा बहा लाया।
त्रिशूली नदी में भीषण उफान से मची तबाही
ग्लेशियर ढहने के बाद जो आइस-रॉक एवलॉन्च हुआ, उसने त्रिशूली नदी का रुख बदल दिया। शुरू में इस मलबे ने नदी को अस्थायी रूप से रोक दिया, जिससे एक छोटी सी झील जैसी स्थिति बन गई। लेकिन जैसे ही यह अवरोध टूटा, भारी मात्रा में पानी और मलबा एक साथ नीचे की ओर उमड़ पड़ा। इसी अचानक आई बाढ़ ने पूरे रसुवा क्षेत्र में व्यापक विनाश किया। सैटेलाइट इमेज के अध्ययन से साफ हुआ कि सर्क ग्लेशियर का ढहना और उसके बाद का मलबा बहाव ही इस आपदा की मुख्य वजह है।

तस्वीरों ने बयां की आपदा की कहानी
NRSC ने आपदा के प्रभाव का जल्द आकलन करने के लिए यूरोपीय उपग्रह सेंटिनेल-2 (24 अगस्त 2026) और ISRO के रिसोर्ससैट-2ए (26 अगस्त 2026) द्वारा ली गई तस्वीरों की तुलना की। इसके अलावा 4 अप्रैल 2026 की पुरानी तस्वीरों को भी नई तस्वीरों से मिलाकर भू-भाग में हुए बदलावों को समझा गया। इन चित्रों ने साफ दिखाया कि नदी का बहाव कितना बदल चुका है, कहाँ-कहाँ मलबा जमा हुआ है, और किन इलाकों में सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। यह स्टडी एक बार फिर साबित करती है कि प्राकृतिक आपदाओं के कारणों को समझने में सैटेलाइट तकनीक कितनी अहम भूमिका निभाती है।
US जियोलॉजिकल सर्वे ने भी की पुष्टि
अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वे (USGS) ने भी इसी नतीजे पर हामी भरी है। एजेंसी के मुताबिक, जिस हलचल को कुछ लोग भूकंप समझ रहे थे, वह दरअसल ग्लेशियर के ढहने और मलबे के बहाव के कारण पैदा हुई थी। इस घटना का असर निचले इलाकों में बेहद विनाशकारी रहा। दोनों संस्थाओं का कहना है कि हिमालयी क्षेत्र में ऐसी घटनाएँ आपस में जुड़ी होती हैं और इनकी भविष्यवाणी करना बेहद चुनौतीपूर्ण होता है।
इस पूरी त्रासदी के केंद्र में सर्क ग्लेशियर था। ये ग्लेशियर पहाड़ों की ढलानों पर कटोरे के आकार में बनते हैं, जहाँ सदियों से बर्फ जमा होती रहती है। जब भूगर्भीय हलचल या जलवायु परिवर्तन के कारण इनकी स्थिरता बिगड़ती है, तो बर्फ और चट्टानें अचानक खिसकने लगती हैं। तिब्बत में भी कुछ ऐसा ही हुआ 4.9 तीव्रता के भूकंप ने इस ग्लेशियर को हिलाकर रख दिया, जिसके बाद विनाश की प्रक्रिया शुरू हुई।
भारत पर कितना खतरा
हालाँकि इस आपदा ने पूरे हिमालयी क्षेत्र में चिंता बढ़ा दी है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि भारत पर इसका सीधा खतरा उतना गंभीर नहीं है। आपदा का मूल स्थान भारत-नेपाल सीमा से 200 किलोमीटर से अधिक दूर है। इसलिए इसका सबसे बुरा असर तिब्बत और नेपाल के प्रभावित नदी क्षेत्रों तक ही सीमित रहने की संभावना है। ISRO ने भारत पर इसके प्रभाव को लेकर अभी कोई औपचारिक बयान नहीं दिया है।
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