पैक्ड फूड लेबलिंग पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र सरकार से कहा- जनस्वास्थ्य से समझौता मंजूर नहीं
Sandesh Wahak Digital Desk: पैक्ड और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड पर फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल अनिवार्य करने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने विकसित राष्ट्रों के फूड-लेबलिंग मानकों को लागू करने में देरी पर केंद्र सरकार को फटकार लगाते हुए स्पष्ट किया कि नागरिकों की सेहत के साथ किसी तरह का समझौता स्वीकार्य नहीं है।
अदालत का दो हफ्ते का अल्टीमेटम
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने केंद्र सरकार को इस विषय पर अंतिम निर्णय लेने हेतु 14 दिन की मोहलत दी है। बेंच ने चेतावनी दी कि यदि सरकार स्वयं प्रभावी कदम नहीं उठाती, तो अदालत आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करने के लिए बाध्य होगी। सुनवाई के दौरान जस्टिस पारदीवाला ने सरकार की हिचकिचाहट पर सवाल उठाते हुए टिप्पणी की कि अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य मानकों से पीछे हटकर क्या भारत अविकसित स्थिति में ही बना रहना चाहता है?
यह मामला एनजीओ ‘3S’ और ‘आवर हेल्थ सोसाइटी’ की जनहित याचिका से जुड़ा है, जिसमें वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव शंकर द्विवेदी ने डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों में अत्यधिक चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट की मात्रा को दर्शाने के लिए पैकेट के आगे स्पष्ट चेतावनी छापने की मांग की है। सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व में FSSAI की लचर कार्यशैली पर भी असंतोष जताया था।
संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वास्थ्य और जीवन के अधिकार का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि उपभोक्ताओं को खान-पान के बारे में सही और स्पष्ट जानकारी पाने का पूरा अधिकार है। इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 के आंकड़ों को उद्धृत करते हुए अदालत ने रेखांकित किया कि बढ़ता मोटापा, खराब जीवनशैली और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड भोजन देश, विशेषकर बच्चों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन चुके हैं।
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