मार्च में 4% से अगस्त में करीब 10% पहुंची थोक महंगाई, समझिए क्या है वजह
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Wholesale Inflation News : वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने 14 सितंबर को अगस्त 2026 के थोक मूल्य सूचकांक यानी WPI के आंकड़े जारी किए। अगस्त में थोक महंगाई बढ़कर 9.92% हो गई, जबकि जुलाई में यह 9.78% थी।
आंकड़ा काफी बड़ा है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि बाजार में हर सामान 10 फीसदी महंगा हो गया है। आखिर WPI का यह आंकड़ा क्या बताता है और इसका आपकी जेब पर कितना असर पड़ सकता है?
WPI यानी थोक मूल्य सूचकांक उस कीमत में बदलाव को मापता है, जिस पर सामान थोक बाजार में बिकता है। यानी फैक्ट्री से सामान निकलने के बाद बड़े व्यापारी या दुकानदार तक पहुंचने के स्तर पर कीमतों में कितना बदलाव हुआ, WPI उसका संकेत देता है।
वहीं, ग्राहक दुकान पर जिस कीमत पर सामान खरीदता है, उसकी तस्वीर CPI यानी खुदरा महंगाई से मिलती है। WPI में स्कूल फीस, डॉक्टर की फीस, किराया या मोबाइल रिचार्ज जैसी सेवाएं शामिल नहीं होतीं। इसमें मुख्य रूप से सामान की कीमतों को देखा जाता है।
अगस्त में WPI महंगाई 9.92% रही। इसका मतलब यह नहीं कि हर सामान 9.92% महंगा हो गया। इसका अर्थ है कि अगस्त 2025 की तुलना में अगस्त 2026 में WPI में शामिल सामानों की कीमतों में औसतन 9.92% बढ़ोतरी हुई।
अगस्त में थोक महंगाई बढ़ाने में सबसे बड़ा दबाव पेट्रोलियम और पावर से जुड़ी कीमतों का रहा। इस कैटेगरी की महंगाई जुलाई के 20.05% से बढ़कर अगस्त में 22.93% हो गई। पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें सालाना आधार पर 38.48%, जबकि कच्चे पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस की कीमतें 34.41% बढ़ीं।
खाने-पीने की चीजों से भी महंगाई पर दबाव रहा। फूड इंडेक्स की महंगाई जुलाई के 6.65% से बढ़कर अगस्त में 7.05% हो गई। तैयार खाद्य उत्पादों की महंगाई 9.65% रही।
हालांकि, हर चीज महंगी नहीं हुई। प्राइमरी आर्टिकल्स की महंगाई 8.52% से घटकर 7.76% और खनिजों की 13.28% से घटकर 8.24% रही। बिजली की महंगाई -1.73% और कंप्यूटर व इलेक्ट्रॉनिक सामान की -0.47% रही।
WPI का असर सीधे आपकी जेब पर नहीं पड़ता, लेकिन आगे चलकर इसका असर खुदरा कीमतों पर आ सकता है। अगर पेट्रोल, स्टील, केमिकल या दूसरे कच्चे माल की कीमत बढ़ती है तो कंपनियों की उत्पादन लागत बढ़ जाती है।
कंपनियां कुछ समय तक इस अतिरिक्त लागत को खुद उठा सकती हैं, लेकिन लागत लंबे समय तक ज्यादा रहने पर उत्पाद की कीमत बढ़ सकती है।
यानी थोक कीमत बढ़ी, कंपनी की लागत बढ़ी और बाद में उत्पाद की खुदरा कीमत बढ़ सकती है। हालांकि प्रतिस्पर्धा, मांग और कंपनी की मार्जिन जैसी चीजें तय करती हैं कि इसका कितना असर ग्राहक तक पहुंचेगा।
WPI मार्च 2026 में 3.98% था, जो अप्रैल में 8.36%, मई में 9.88% और जून में 9.97% तक पहुंच गया। इस बढ़ोतरी में बेस इफेक्ट की भी भूमिका है। पिछले साल अप्रैल-अगस्त के दौरान WPI औसतन -0.20% था, जबकि इस साल इसी अवधि में यह करीब 9.56% रहा।
इसलिए 9.92% WPI का मतलब आपकी जेब पर सीधे 10% महंगाई नहीं है, लेकिन यह जरूर संकेत है कि थोक बाजार में कीमतों का दबाव काफी ज्यादा बना हुआ है।
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