फैटी लिवर और विटामिन-D के बीच गहरा जैविक संबंध उजागर, SGPGI–ICMR अध्ययन में बड़ा खुलासा
Sandesh Wahak Digital Desk: राजधानी स्थित संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (SGPGI) के शोधकर्ताओं ने फैटी लिवर रोग और शरीर में विटामिन डी की कमी के बीच एक महत्वपूर्ण जैविक संबंध का पता लगाया है।
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के सहयोग से किए गए इस अध्ययन में सामने आया है कि फैटी लिवर की गंभीर अवस्था शरीर की विटामिन डी को सक्रिय करने की क्षमता को कमजोर कर सकती है।
SGPGI के एंडोक्रिनोलॉजी विभाग में एडीशनल प्रोफेसर डॉ. रोहित एंथनी सिन्हा के नेतृत्व में हुए इस शोध में बताया गया कि अत्यधिक वसा और चीनी युक्त आहार लिवर के कार्य को प्रभावित करता है।

खास तौर पर मेटाबॉलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीटोहेपेटाइटिस (MASH/NASH) की स्थिति में लिवर में मौजूद CYP2R1 नामक एंजाइम की सक्रियता घट जाती है, जो विटामिन डी को उसके सक्रिय रूप में बदलने के लिए आवश्यक होता है।
डॉ. सिन्हा और पीएचडी शोधार्थी अभिषेक यादव की टीम ने जानवरों के मॉडल और मानव लिवर नमूनों के अध्ययन में पाया कि फैटी लिवर के मरीजों में विटामिन डी की कमी केवल धूप या आहार की कमी के कारण नहीं, बल्कि लिवर की बिगड़ी हुई कार्यप्रणाली से भी जुड़ी हो सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार MASH/NASH फैटी लिवर का गंभीर रूप है, जिससे आगे चलकर लिवर फाइब्रोसिस और सिरोसिस जैसी जटिल स्थितियां विकसित हो सकती हैं।
विटामिन डी के सक्रिय होने की प्रक्रिया में रुकावट इस बीमारी की प्रगति को और तेज कर सकती है।
डॉ. सिन्हा ने कहा कि यह अध्ययन फैटी लिवर रोगियों में विटामिन डी की कमी के पीछे के जैविक कारणों को स्पष्ट करता है और भविष्य में रोग की प्रगति को धीमा करने की नई उपचार रणनीतियों के विकास में सहायक हो सकता है।
शोधकर्ताओं ने सलाह दी है कि फैटी लिवर से पीड़ित मरीज नियमित रूप से विटामिन डी स्तर की जांच कराएं, संतुलित आहार और स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं तथा चिकित्सकीय परामर्श के अनुसार आवश्यक होने पर सप्लीमेंट लें।
अध्ययन के निष्कर्ष फैटी लिवर की रोकथाम और बेहतर उपचार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माने जा रहे हैं।
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