टीम इंडिया से बाहर, BCCI कॉन्ट्रैक्ट भी गया… फिर कप्तानी ने बदली ईशान किशन की किस्मत

Sports News: कभी टीम इंडिया के तीनों फॉर्मेट में अपनी जगह बनाने वाले ईशान किशन के करियर में एक ऐसा दौर भी आया, जब वह अचानक भारतीय टीम की योजनाओं से बाहर हो गए।

BCCI का सेंट्रल कॉन्ट्रैक्ट गंवाने के बाद करीब दो साल तक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से दूरी रही। जिस खिलाड़ी को भारतीय क्रिकेट का भविष्य माना जा रहा था, उसके करियर पर सवाल उठने लगे।

लेकिन इसी मुश्किल दौर में ईशान ने खुद को नए सिरे से तैयार किया। उनकी वापसी की कहानी में बल्ले के साथ-साथ झारखंड की कप्तानी की भी बड़ी भूमिका रही।

अब दलीप ट्रॉफी फाइनल में 270 रनों की शानदार पारी ने उनके बदले हुए अंदाज को एक बार फिर सामने ला दिया है।

जब तेजी से बदली ईशान की कहानी

2023 के मध्य तक ईशान का करियर तेजी से आगे बढ़ रहा था। वेस्टइंडीज दौरे पर टेस्ट डेब्यू के बाद वह भारत के उन खिलाड़ियों में शामिल हो गए थे, जो तीनों फॉर्मेट में टीम का हिस्सा बन रहे थे।

इसके बाद दक्षिण अफ्रीका दौरे के दौरान उन्होंने टेस्ट कैंप छोड़ दिया। घरेलू क्रिकेट खेलने को लेकर BCCI की अपेक्षाओं के मुताबिक भी वह मैदान पर नहीं उतरे। इसका असर उनकी टीम इंडिया की जगह और सेंट्रल कॉन्ट्रैक्ट पर पड़ा।

कुछ ही समय में राष्ट्रीय टीम की योजनाओं में अहम नजर आने वाला खिलाड़ी भारतीय क्रिकेट से दूर हो गया।

झारखंड की कप्तानी बनी टर्निंग प्वाइंट

घरेलू क्रिकेट में वापसी के बाद ईशान ने झारखंड की कप्तानी संभाली। यही जिम्मेदारी उनके लिए बड़ा बदलाव लेकर आई।

ईशान के मुताबिक कप्तानी ने उन्हें सिर्फ एक बल्लेबाज के तौर पर नहीं, बल्कि एक खिलाड़ी और लीडर के रूप में भी बेहतर बनाया।

Ishan Kishan

अब उनका ध्यान सिर्फ अपनी बल्लेबाजी पर नहीं रहता था। उन्हें टीम के हर खिलाड़ी की स्थिति, उसकी जरूरत और टीम के प्रदर्शन के बारे में भी सोचना पड़ता था।

दलीप ट्रॉफी में 270 रन की पारी के बाद ईशान ने बताया कि कप्तानी ने उन्हें काफी बदला। उन्होंने यह भी कहा कि इस जिम्मेदारी ने उन्हें उनके पुराने ‘वाइल्ड चाइल्ड’ वाले दौर से बाहर निकलने में मदद की।

‘अब सिर्फ मेरे रन मायने नहीं रखते’

ईशान ने माना कि युवा खिलाड़ी के तौर पर उनकी सोच अलग थी। अब वह खुद टीम के स्थापित खिलाड़ियों में हैं, इसलिए टीम का स्कोर आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी भी उन्हें महसूस होती है।

कप्तानी ने उन्हें यह समझाया कि किसी खिलाड़ी का योगदान सिर्फ उसके व्यक्तिगत आंकड़ों से तय नहीं होता। उसकी पारी टीम के लिए कितनी उपयोगी रही, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

कप्तान के तौर पर उन्होंने यह भी महसूस किया कि टीम के बाकी खिलाड़ियों को बेहतर बनाने में मदद करना भी उनकी जिम्मेदारी है।

नेट्स में किसी खिलाड़ी की कमी पहचानना और उसे सुधारने में मदद करना कप्तानी का हिस्सा बन गया।

कप्तानी के साथ ईशान के घरेलू क्रिकेट प्रदर्शन में भी सुधार देखने को मिला। 2025-26 रणजी ट्रॉफी में उन्होंने शतक लगाए।

इसके बाद सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी में झारखंड की खिताबी जीत में उन्होंने अहम भूमिका निभाई और 517 रन बनाए। इस दौरान उनके बल्ले से दो शतक भी निकले।

इन प्रदर्शनों के बाद ईशान की टीम इंडिया में वापसी का रास्ता खुला। पहले उन्हें टी20 इंटरनेशनल टीम में जगह मिली और IPL में अच्छे प्रदर्शन के बाद वनडे टीम में भी वापसी हुई।

270 रन की पारी में दिखा कप्तानी का असर

दलीप ट्रॉफी फाइनल में ईशान की 270 रन की पारी उनके बदले हुए क्रिकेटिंग माइंडसेट की मिसाल बनी।

ईशान को हमेशा से आक्रामक बल्लेबाजी के लिए जाना जाता है, लेकिन इस पारी में उन्होंने परिस्थितियों के हिसाब से अपने खेल को नियंत्रित किया।

टीम को बड़ा स्कोर चाहिए था और ऐसे में उन्होंने लंबे समय तक क्रीज पर टिककर बल्लेबाजी की।

कई मौकों पर आक्रामक शॉट खेलने का विकल्प होने के बावजूद उन्होंने टीम की जरूरत को प्राथमिकता दी। यही उनके पुराने और मौजूदा अंदाज के बीच सबसे बड़ा अंतर नजर आया।

टीम इंडिया से दूरी ने दिया सबक

ईशान की कहानी सिर्फ फॉर्म में वापसी की नहीं है। उन्होंने अपने करियर के उस दौर में टीम इंडिया की जगह गंवाई, जब उन्हें भारतीय क्रिकेट के भविष्य का हिस्सा माना जा रहा था। सेंट्रल कॉन्ट्रैक्ट गया, घरेलू क्रिकेट में लौटना पड़ा और फिर कप्तानी की जिम्मेदारी मिली।

यही जिम्मेदारी उनके लिए सीख का जरिया बनी। कप्तानी ने उन्हें टीम के नजरिए से खेलना सिखाया और व्यक्तिगत प्रदर्शन से आगे बढ़कर टीम के लक्ष्य को प्राथमिकता देना सिखाया।

कभी अपनी विस्फोटक बल्लेबाजी और आक्रामक अंदाज के लिए पहचाने जाने वाले ईशान अब धैर्य, जिम्मेदारी और परिस्थितियों को समझने की बात करते हैं।

270 रन का आंकड़ा भले ही स्कोरबोर्ड पर दर्ज है, लेकिन इसके पीछे ईशान के बदले हुए खेल और सोच की कहानी भी नजर आती है।

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