गिरफ्तारी पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश, लिखित वजह नहीं बताई तो अवैध होगी कार्रवाई, जानें 5 बड़े नियम
Supreme Court Arrest Guidelines: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को गिरफ्तारी और हिरासत को लेकर अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ किया कि किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करते समय उसे गिरफ्तारी के आधार (Grounds of Arrest) लिखित रूप में देना जरूरी है। ये जानकारी ऐसी भाषा में होनी चाहिए, जिसे गिरफ्तार व्यक्ति समझता हो। कोर्ट ने इसे संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत मिलने वाला मौलिक अधिकार बताया है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह संवैधानिक सुरक्षा केवल सामान्य अपराधों तक सीमित नहीं है। PMLA और UAPA जैसे विशेष कानूनों के तहत होने वाली गिरफ्तारियों में भी आरोपी को गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में बताना जरूरी है। अदालत ने कहा कि अपराध कितना भी गंभीर क्यों न हो, इस संवैधानिक सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
Supreme Court की Guidelines में क्या-क्या कहा गया?
1. गिरफ्तारी की वजह लिखित में देनी होगी
पुलिस या जांच एजेंसी को आरोपी को गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में देने होंगे। केवल मौखिक तौर पर कारण बता देना पर्याप्त नहीं होगा। इसका मकसद आरोपी को अपनी गिरफ्तारी का आधार समझने और कानूनी मदद लेने का मौका देना है।
2. भाषा ऐसी हो, जिसे आरोपी समझ सके
गिरफ्तारी के आधार ऐसी भाषा में होने चाहिए, जिसे गिरफ्तार व्यक्ति समझता हो। सिर्फ कानूनी भाषा में दस्तावेज थमा देना पर्याप्त नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल गिरफ्तारी के आधार पढ़कर सुना देना भी इस संवैधानिक जरूरत को पूरा नहीं करता।
3. PMLA और UAPA में भी यही नियम लागू
मनी लॉन्ड्रिंग (PMLA) और गैरकानूनी गतिविधियों से जुड़े मामलों में UAPA के तहत गिरफ्तारी पर भी यह सुरक्षा लागू होगी। सुप्रीम कोर्ट पहले ही Pankaj Bansal मामले में PMLA और Prabir Purkayastha मामले में UAPA के संदर्भ में लिखित आधार देने की जरूरत स्पष्ट कर चुका है। अब अदालत ने इस संवैधानिक सुरक्षा को सभी अपराधों पर लागू होने वाले सिद्धांत के रूप में दोहराया है।
4. नियम टूटा तो गिरफ्तारी और रिमांड अवैध हो सकती है
अगर गिरफ्तारी के समय लिखित आधार देने की संवैधानिक जरूरत पूरी नहीं की गई, तो गिरफ्तारी अवैध मानी जा सकती है। इसके आधार पर आगे की रिमांड भी प्रभावित हो सकती है और आरोपी को रिहा किया जा सकता है।
5. अवैध गिरफ्तारी के बाद सीधे दोबारा गिरफ्तार नहीं कर सकती पुलिस
अगर लिखित आधार नहीं देने के कारण पहली गिरफ्तारी अवैध घोषित कर आरोपी को रिहा कर दिया गया, तो पुलिस उसे अपनी मर्जी से उसी मामले में दोबारा गिरफ्तार नहीं कर सकती। इसके लिए पहले संबंधित Judicial Magistrate की मंजूरी लेनी होगी। दोबारा गिरफ्तारी के आवेदन में यह भी बताना होगा कि पहली बार गिरफ्तारी के समय आधार क्यों नहीं दिए गए थे।
पुलिस अधिकारी की भी तय होगी जवाबदेही

सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी की प्रक्रिया में लापरवाही करने वाले पुलिस अधिकारी की जवाबदेही भी तय की है। अदालत ने कहा कि अगर किसी अधिकारी ने अनुच्छेद 22(1) का पालन करते हुए गिरफ्तारी के लिखित आधार नहीं दिए, तो उसके खिलाफ विभागीय जांच शुरू की जानी चाहिए। अगर बाद में आरोपी को दोबारा गिरफ्तार करने की जरूरत पड़ती है, तो आगे की जांच दूसरे अधिकारी को सौंपने का निर्देश भी दिया गया है।
अदालत ने गाइडलाइन (Supreme Court Arrest Guidelines) में साफ किया कि गिरफ्तारी के समय मिलने वाला यह संवैधानिक संरक्षण अपराध की गंभीरता पर निर्भर नहीं करता। यानी गंभीर से गंभीर अपराध में भी जांच एजेंसी को आरोपी को उसके खिलाफ गिरफ्तारी के आधार बताने होंगे। सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, यह प्रक्रिया व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के लिए जरूरी है।
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