डिप्टी सीएम की कार्रवाई पर उठे सवाल! बिना आरोप पत्र के स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों को किया सस्पेंड
CMO डॉ. नेमी पर जेएम फार्मा के खिलाफ साजिश रचने के आरोप, RTI ने बताई जांच की असलियत
Sandesh Wahak Digital Desk/Chetan Gupta: उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग में एक बार फिर प्रशासनिक निर्णयों को लेकर बहस तेज हो गई है। डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक द्वारा भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के आरोपों के आधार पर एसीएमओ समेत कई अधिकारियों को बिना आरोप पत्र निलंबित किए जाने पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।


यह मामला तब और संवेदनशील हो गया जब कुछ समय पहले सीएमओ डॉ. हरिदत्त नेमी को भी इसी तरह आरोप पत्र दिए बिना निलंबित किया गया था, जिसमें बाद में लखनऊ हाईकोर्ट ने उन्हें राहत दी थी। अब एक बार फिर जांच और आरोपों की पारदर्शिता को लेकर विभाग की कार्यशैली पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

RTI में खुलासा
इस पूरे प्रकरण में RTI (सूचना का अधिकार) के जरिए सामने आए तथ्यों ने कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। आरोप है कि सीएमओ डॉ. हरिदत्त नेमी द्वारा जेएम फार्मा को साज़िश के तहत निशाना बनाया गया। RTI के अनुसार, जांच कमेटी ने जिन मेडिकल सामग्रियों को घटिया घोषित किया, उनकी कोई लैब जांच नहीं करवाई गई।
जांच रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने वाले एसीएमओ स्टोर डॉ. आरपी मिश्रा और पूर्व सीएमओ डॉ. उदयनाथ ने भी इस बात की पुष्टि की है कि रिपोर्ट डॉ. नेमी के दबाव में तैयार की गई थी।
गौरतलब है कि डॉ. आरपी मिश्रा न केवल इस जांच कमेटी के सदस्य थे, बल्कि क्रय समिति में भी उनकी भूमिका रही है। RTI से मिले जवाब में उन्होंने स्वीकार किया कि रिपोर्ट तथ्यों पर नहीं, बल्कि दबाव में आधारित थी।

पीड़ित का आरोप: मानसिक, शारीरिक और आर्थिक उत्पीड़न
जेएम फार्मा के मालिक राजेश शुक्ला का आरोप है कि इस पूरे मामले में उन्हें मानसिक, शारीरिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित किया गया। उन्होंने सरकार से मांग की है कि इस मामले की निष्पक्ष जांच हो और डॉ. नेमी के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।
क्या फिर होगी विभाग की किरकिरी?
इस प्रकरण ने न सिर्फ स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि यह भी चिंता जताई जा रही है कि बिना आरोप पत्र और जांच के आधार पर लिए गए फैसले कहीं कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर विभाग को फिर से शर्मिंदगी न दिला दें।
सवाल यह भी उठ रहा है कि :-
- क्या बिना जांच के लिए गए निर्णय वैध हैं?
- क्या RTI में सामने आए तथ्यों पर कोई विभागीय या कानूनी कार्रवाई होगी?
- डिप्टी सीएम तक गलत सूचना किसने पहुंचाई और क्यों?
- नेतृत्व पर सवाल या सिस्टम की कमजोरी?
राज्य में भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की नीति के तहत डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक का रुख सख्त रहा है, लेकिन बिना आरोप पत्र के निलंबन जैसे फैसले शासन की पारदर्शिता और प्रक्रियाओं पर सवाल खड़े करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में कानूनी प्रक्रिया और साक्ष्यों की पुख्ता जांच बेहद जरूरी है, ताकि किसी निर्दोष को सजा न मिले और दोषियों को बचने का मौका न।

