केरल सरकार का बड़ा कदम, राष्ट्रपति द्वारा भेजे रेफरेंस पर सुप्रीम कोर्ट में जताई आपत्ति

Sandesh Wahak Digital Desk: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा अनुच्छेद 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट से विधेयकों की मंजूरी को लेकर मांगी गई राय (प्रेसिडेंशियल रेफरेंस) पर अब केरल सरकार ने आपत्ति जताई है। सोमवार को केरल ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर करते हुए कहा कि यह सुनवाई योग्य नहीं है और इसे बिना जवाब दिए ही लौटा दिया जाना चाहिए। केरल सरकार का कहना है कि अनुच्छेद 200 में प्रयुक्त “यथाशीघ्र” (as soon as possible) शब्द अपने आप में राज्यपाल के लिए समयसीमा तय करता है, और इस विषय पर पहले ही सुप्रीम कोर्ट की तीन न्यायाधीशों की पीठ फैसला दे चुकी है।

क्या है पूरा मामला?

दरअसल, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट से यह राय मांगी थी कि राज्यपाल और राष्ट्रपति द्वारा विधेयकों को मंजूरी देने की प्रक्रिया और समयसीमा को लेकर क्या स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं। इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने 22 जुलाई को सभी राज्य सरकारों और केंद्र को नोटिस भेजा था। लेकिन केरल सरकार ने कहा कि यह पूरा रेफरेंस ही “त्रुटिपूर्ण तथ्यों” पर आधारित है। राज्य ने अपनी दलील में कहा कि यह रेफरेंस यह दर्शाता है कि अनुच्छेद 200 राज्यपाल के लिए कोई समयसीमा नहीं निर्धारित करता, जबकि वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। केरल ने अपनी दलील को मजबूत करते हुए सुप्रीम कोर्ट को याद दिलाया कि इससे जुड़े अहम बिंदु पहले ही इन तीन मामलों में तय किए जा चुके हैं:

  1. तेलंगाना बनाम राज्यपाल की सचिव (2023)

  2. पंजाब बनाम राज्यपाल के प्रमुख सचिव (2023)

  3. तमिलनाडु बनाम तमिलनाडु के राज्यपाल (2025)

केरल का कहना है कि राष्ट्रपति के रेफरेंस में जिन 14 सवालों को उठाया गया है, उनमें से 11 सवाल सीधे-सीधे तमिलनाडु मामले में तय किए जा चुके हैं। इसके बावजूद उस फैसले का ज़िक्र नहीं किया गया, जो अपने आप में संदर्भ को खारिज करने का आधार है।

सुप्रीम कोर्ट को क्यों किया आगाह?

केरल की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील के. के. वेणुगोपाल ने संविधान पीठ के सामने कहा कि यह रेफरेंस कहीं न कहीं सुप्रीम कोर्ट को उसके ही पुराने फैसलों को पलटने की ओर धकेलने की कोशिश है, जो अनुच्छेद 143 का “गंभीर दुरुपयोग” है। राज्य का यह भी कहना है कि अगर तमिलनाडु केस के फैसले का उल्लेख किया गया होता, तो सवाल ही खत्म हो जाते। अब जबकि समयसीमा और प्रक्रिया को लेकर पहले ही मार्गदर्शन मिल चुका है, तो दोबारा बहस कराना संविधान की भावना के विपरीत है।

यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के सामने है और आने वाले दिनों में यह तय होगा कि प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर सुनवाई होगी या नहीं। लेकिन केरल सरकार का यह रुख अन्य राज्यों के लिए भी मिसाल बन सकता है, खासकर तब जब केंद्र-राज्य संबंधों में संवैधानिक संतुलन की बात हो रही हो।

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