Varanasi News: ‘वंदे मातरम्’ की 150वीं वर्षगांठ पर सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में हुआ विशेष आयोजन
“एक गीत, एक भावना, एक भारत” विषय पर शुरू हुआ वर्षभर चलने वाला कार्यक्रम
Sandesh Wahak Digital Desk: सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय (वाराणसी) के संस्कृत विद्या विभाग में राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ की 150वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में गुरुवार को विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम का विषय था – “वंदे मातरम् : एक गीत, एक भावना, एक भारत”, जो पूरे एक वर्ष तक चलेगा।
कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने की। उन्होंने कहा, “वंदे मातरम् सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि यह भारत की राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है।
यह गीत उस समय की सुप्त चेतना को जगाने वाला स्वर बना, जिसने स्वतंत्रता संग्राम में नई ऊर्जा भरी।”
उन्होंने बताया कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने इस गीत की रचना 7 नवंबर 1875 को की थी और इसे 1882 में आनंदमठ उपन्यास में प्रकाशित किया गया था।
“वंदे मातरम् आज भी देशभक्ति की भावना को प्रबल करता है और मातृभूमि के प्रति सम्मान सिखाता है,”

मुख्य वक्ता ने बताई गीत की ऐतिहासिक यात्रा
कार्यक्रम में बतौर मुख्य वक्ता छात्र कल्याण संकायाध्यक्ष प्रो. शैलेश कुमार मिश्र ने कहा कि “वंदे मातरम् संस्कृत में रचित लेकिन बंगाली लिपि में लिखा गया गीत है।
यह पहले ‘बंगदर्शन’ पत्रिका में 7 नवंबर 1875 को प्रकाशित हुआ था। बाद में आनंदमठ में इसे शामिल किया गया और रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे सुरों में पिरोया।”
उन्होंने कहा, “एक कविता से राष्ट्रीय गीत बनने की वंदे मातरम् की यात्रा भारतीय इतिहास का अमर अध्याय है।”
अतिथियों ने रखे विचार
प्रो. हरिप्रसाद अधिकारी (पूर्व आचार्य, तुलनात्मक धर्म दर्शन विभाग) ने कहा, “बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने वंदे मातरम् के माध्यम से आज़ादी के संघर्ष को शब्दों में जीवित कर दिया। यह गीत सिर्फ नारा नहीं, बल्कि जनजागरण का प्रतीक है।”
प्रो. हरिशंकर पांडेय (पूर्व संकायाध्यक्ष, श्रमण विद्या संकाय) ने कहा कि “वंदे मातरम् ने समाज में राष्ट्रप्रेम और सहयोग की भावना को जन्म दिया, जिससे स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा मिली।”
सामूहिक गायन और सहभागिता
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के छात्रों और अध्यापकों ने सामूहिक रूप से ‘वंदे मातरम्’ गीत का गायन किया।
कार्यक्रम का संयोजन और संचालन डॉ. रविशंकर पांडेय ने किया। इस दौरान डॉ. विशाखा शुक्ला समेत बड़ी संख्या में शिक्षक और विद्यार्थी उपस्थित रहे।

