वंदे मातरम पर संसद में गूंजी राष्ट्रभक्ति, अमित शाह बोले- यह गीत नहीं, आज़ादी के लिए शक्तिशाली मंत्र है
Sandesh Wahak Digital Desk: संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान मंगलवार को राज्यसभा में वंदे मातरम पर एक विशेष चर्चा शुरू हुई, जिसने सदन में राष्ट्रभक्ति का माहौल बना दिया। चर्चा की शुरुआत करते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने इसे महज एक गीत मानने से इनकार कर दिया।
अमित शाह ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वंदे मातरम केवल एक गीत नहीं, बल्कि देश की आज़ादी, राष्ट्रीय चेतना और माँ भारती के प्रति समर्पण का एक शक्तिशाली मंत्र है। उन्होंने जोर दिया कि इस विषय को किसी भी राजनीतिक नज़रिए से नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि यह भारत के गौरव और राष्ट्रभक्ति से सीधे जुड़ा है।
आजादी के संग्राम का उद्घोष
गृह मंत्री ने बताया कि बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की यह अमर रचना (वंदे मातरम) पहली बार 7 नवंबर, 1875 को सार्वजनिक हुई थी। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे इस रचना ने आज़ादी की लड़ाई में ऐसा जोश भरा कि यह नारा देशभर में स्वतंत्रता का उद्घोष बन गया। अमित शाह ने उन लोगों पर भी कटाक्ष किया, जो इस चर्चा पर सवाल उठा रहे हैं। उन्होंने कहा, जिन्हें यह समझ नहीं आ रहा कि वंदे मातरम पर चर्चा क्यों हो रही है, उन्हें अपनी समझ पर नए सिरे से विचार करना चाहिए।
मातृभूमि का महिमामंडन हमारी सदियों पुरानी परंपरा है। बंकिम बाबू से लेकर रामायण में भगवान राम, आचार्य शंकर, चाणक्य और अनेक महान व्यक्तित्वों ने इसका गौरव गान किया है। मातृभूमि हमारे अस्तित्व का अभिन्न हिस्सा है
– अमित शाह🔥🚨 pic.twitter.com/KyZlDooLcb— Wali (@Netaji_bond_) December 9, 2025
2047 में भी प्रासंगिक रहेगी भावना
शाह ने वंदे मातरम की प्रासंगिकता पर बात करते हुए कहा कि यह गीत आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना स्वतंत्रता संग्राम के दौरान था। उन्होंने कहा, जब 2047 में भारत विकसित राष्ट्र बनने की ओर बढ़ रहा होगा, तब भी वंदे मातरम की भावना उतनी ही मजबूत रहेगी। उन्होंने कहा कि इस गीत ने देश को जागरूक किया, युवाओं को प्रेरित किया, और शहीदों के लिए यह अंतिम मंत्र बना, जिसने उन्हें अगला जन्म भी इसी भारत भूमि पर लेने की प्रेरणा दी। गृह मंत्री ने अंत में स्पष्ट किया कि वंदे मातरम को बंगाल चुनाव से जोड़कर देखना गलत है। यह गीत बंगाल ही नहीं, पूरे देश की धड़कन है और दुनियाभर में भारत की पहचान है।
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