सपा सांसद अफजाल अंसारी के इस काम के मुरीद हुए शंकराचार्य, पत्र लिखकर की जमकर तारीफ
Sandesh Wahak Digital Desk: उत्तर प्रदेश की राजनीति में अक्सर तीखी बयानबाजी देखने को मिलती है, लेकिन गाजीपुर से समाजवादी पार्टी के सांसद अफजाल अंसारी और ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के बीच हुई बातचीत ने एक नई और सकारात्मक चर्चा छेड़ दी है। शंकराचार्य ने अफजाल अंसारी को एक विशेष पत्र भेजकर गाय की गरिमा और सुरक्षा के मुद्दे पर उनके स्टैंड की सराहना की है।
‘गाय का घी अमृत है’
एक इंटरव्यू के दौरान अफजाल अंसारी ने गाय के प्रति अपनी भावनाओं को खुलकर साझा किया। उन्होंने कहा कि मुसलमानों के बारे में यह गलत प्रोपेगेंडा फैलाया गया है कि वे गाय के प्रति सम्मान नहीं रखते। उन्होंने अपने बचपन का एक निजी किस्सा साझा करते हुए कहा “बचपन में जब हमें सीने में जकड़न या नजला (जुकाम) होता था, तो मां गाय का पुराना घी मंगाकर छाती पर मलती थीं। इसे सर्वोत्तम दवा माना जाता था। गाय का घी सभी के लिए अमृत के समान है।”
सांसद ने दो टूक शब्दों में कहा कि इस्लाम को मानने वालों की गाय के प्रति भावना के बारे में गलत धारणाएं भरी गई हैं। उन्होंने कहा कि जो लोग सोचते हैं कि मुसलमान गो-मांस के लिए आतुर रहते हैं, वे शायद अपने नबी की बातों को ठीक से समझ ही नहीं पाए। अंसारी ने जोर देकर कहा कि इस देश में मुसलमानों की मंशा कभी भी हिंदू धर्म की मान्यताओं को आहत करने की नहीं रही है।
शंकराचार्य के अभियान को मिला समर्थन
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद लंबे समय से गाय को ‘राष्ट्र माता’ घोषित करने और गो-हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग को लेकर ‘गौ प्रतिष्ठा यात्रा’ निकाल रहे हैं। उनके इस अभियान का समर्थन करते हुए अफजाल अंसारी ने कहा सांसद ने कहा कि वह सार्वजनिक मंचों पर इस अभियान की प्रशंसा करते हैं और समय आने पर संसद के भीतर भी गो-रक्षा के विषय को मजबूती से उठाएंगे। अपने पत्र में शंकराचार्य ने इस बात की खुशी जताई है कि एक मुस्लिम जनप्रतिनिधि गाय की सुरक्षा के विषय पर इतनी स्पष्टता और संवेदनशीलता के साथ अपनी बात रख रहा है।
क्यों खास है यह पत्र?
यह पत्र इसलिए चर्चा में है क्योंकि यह सामाजिक समरसता और धार्मिक सद्भाव की एक नई मिसाल पेश करता है। जहाँ एक तरफ शंकराचार्य गो-रक्षा के लिए कड़े कानून की मांग कर रहे हैं, वहीं अफजाल अंसारी जैसे नेता का समर्थन इस मुद्दे को एक साझा सांस्कृतिक पहचान से जोड़ता है।
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