फ़िराक़ गोरखपुरी: जिनके लफ़्ज़ों में धड़कती थी हिंदुस्तान की साझी तहजीब, लखनऊ में याद किए गए महान शायर

Sandesh Wahak Digital Desk: लखनऊ के साहित्यिक गलियारों में एक बार फिर उर्दू अदब की खुशबू महकी, जब ‘रोशनी की ओर’ सोसाइटी और उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में महान शायर फ़िराक़ गोरखपुरी के जीवन और उनकी साहित्यिक सेवाओं पर एक भव्य सेमिनार का आयोजन किया गया। यूपी प्रेस क्लब में आयोजित इस कार्यक्रम में विद्वानों ने फिराक की शायरी को भारतीय संस्कृति का आईना करार दिया।

“फ़िराक़ गोरखपुरी महज़ एक शायर नहीं, बल्कि एक मुकम्मल तहजीब का नाम थे। उनकी शायरी में वह जादुई आकर्षण था जो इंसानियत को जोड़ने की ताकत रखता था।” ये शब्द वरिष्ठ पत्रकार और ‘रोज़नामा इंकलाब’ के पूर्व एडिटर अहमद इब्राहिम अल्वी के हैं, जो उन्होंने ‘फिराक गोरखपुरी: हयात व खिदमत’ (जीवन और सेवा) विषय पर आयोजित सेमिनार में मुख्य वक्ता के तौर पर कहे।

संस्कृति और प्रेम का बेमिसाल संगम

अहमद इब्राहिम अल्वी ने फिराक के व्यक्तित्व पर रोशनी डालते हुए कहा कि फिराक की शायरी में भारत की महान सांस्कृतिक भावना झलकती है। उन्होंने हमेशा उर्दू ज़बान की वकालत की, लेकिन उनकी कविताएं किसी एक भाषा या धर्म तक सीमित नहीं रहीं। उनकी नज़्में और ग़ज़लें कल्पना की एक ऐसी दुनिया सजाती हैं, जहाँ सिर्फ प्यार और मोहब्बत के दीये जलते हैं। फिराक ने अपनी शायरी के जरिए उस तहजीब को जिंदा रखा जो सबको साथ लेकर चलने में विश्वास रखती है।

भूगोल और सीमाओं से परे फिराक की सोच

सेमिनार में विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद लखनऊ विश्वविद्यालय के उर्दू विभागाध्यक्ष डॉ. अब्बास रजा नैयर ने फिराक की कलात्मकता की सराहना की। उन्होंने कहा, “फिराक के पास गजब का सौंदर्य बोध था। उन्होंने देश की मिट्टी की खुशबू को अपनी शायरी में पिरोया था। भले ही उनके नाम के साथ ‘गोरखपुरी’ जुड़ा हो और माध्यम उर्दू रहा हो, लेकिन एक महान शायर को देश, भाषा या नस्ल की सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता। फिराक पूरी इंसानियत की धरोहर हैं।” डॉ. नैयर ने जोर दिया कि फिराक की शायरी में विचार, विषय और शैली का एक ऐसा सामंजस्य है जो उर्दू साहित्य में विरल है।

अंग्रेजी के शिक्षक, उर्दू के आशिक

परवेज मलिकजादा ने फिराक को श्रद्धांजलि देते हुए उनके जीवन के एक दिलचस्प पहलू पर बात की। उन्होंने बताया कि फिराक अंग्रेजी साहित्य के मेधावी शिक्षक थे, लेकिन उनका दिल उर्दू के लिए धड़कता था। उन्होंने न केवल इस भाषा को अपनाया, बल्कि इसे वह ऊंचाई दी कि वे जन-जागरूकता और लोकतंत्र के सबसे बड़े समर्थक बनकर उभरे।

आजादी के आंदोलन और आम आदमी की पीड़ा

इंडियन नेशनल लीग के स्टेट प्रेसिडेंट हाजी फहीम सिद्दीकी और ऑल इंडिया जमीयत-ए-कुरैश के अध्यक्ष शहजाद कुरैशी ने फिराक के राजनीतिक और सामाजिक नजरिए पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि फिराक की शायरी में उस समय के गुलाम भारत की बेबसी और आम आदमी की परेशानियां साफ दिखती हैं। वे साम्राज्यवादी शासन के सख्त खिलाफ थे और यूरोपीय सभ्यता के अंधानुकरण का विरोध करते थे।

नया स्टाइल और भारतीयता का पुट

सेमिनार के दौरान ज़ियाउल्लाह सिद्दीकी, मुमताज़ अहमद नदवी, राशिद खान नदवी और अन्य विद्वानों ने अपने शोध पत्र पढ़े। उन्होंने बताया कि फिराक ने उर्दू शायरी को एक नया ‘अंदाज-ए-बयां’ दिया, जो पूरी तरह भारतीय था। जब फिराक ने लिखना शुरू किया, तब देश में राष्ट्रीय आंदोलनों की लहर थी। फिराक न सिर्फ इन आंदोलनों से प्रभावित थे, बल्कि उन्होंने खुद भी इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

सम्मान और स्वागत का दौर

कार्यक्रम का सफल संचालन सीमा सिद्दीकी ने किया। सोसाइटी की अध्यक्ष और कार्यक्रम की कन्वीनर रंजना शर्मा ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए ‘रोशनी की ओर’ संस्था के उद्देश्यों को रेखांकित किया। इस मौके पर पत्रकारिता में उत्कृष्ट योगदान के लिए सैयद आक़िल (स्टेट हेड, श्री न्यूज़) को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत कुरान की तिलावत, नात और मनकबत से हुई, जिसने माहौल को रूहानी बना दिया।

अंत में, रंजना शर्मा ने सभी गणमान्य अतिथियों और वक्ताओं का आभार व्यक्त करते हुए सेमिनार के सफल समापन की घोषणा की। इस कार्यक्रम ने एक बार फिर साबित कर दिया कि फिराक जैसे शायर मरते नहीं, बल्कि अपनी शायरी के जरिए हर दौर में जिंदा रहते हैं।

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