Bareilly News: सरकारी फाइलों में दबा गरीब का आशियाना, रिश्वत न देने पर नहीं मिला आवास!

Sandesh Wahak Digital Desk: बरेली के आंवला से एक ऐसी खबर आई है जो सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच के बड़े अंतर को उजागर करती है। जहां एक तरफ सरकार हर सिर पर छत का वादा करती है, वहीं रतनपाल जैसे लोग सिस्टम की सुस्ती और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहे हैं।

मोहल्ला फूटा दरवाजा (वार्ड नंबर 8) के रहने वाले रतनपाल के लिए ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’ महज एक अधूरा सपना बनकर रह गई है। पिछले दस सालों से वे अपनी जर्जर छत को पक्का कराने के लिए नगर पालिका से लेकर जिला मुख्यालय तक की चौखट घिस चुके हैं, लेकिन उन्हें मिली तो सिर्फ मायूसी।

कुदरत की मार और सिस्टम की बेरुखी

रतनपाल की कहानी सुनकर दिल पसीज जाता है। वे बताते हैं कि मजदूरी के चंद रुपयों से बमुश्किल दो वक्त की रोटी नसीब होती है, ऐसे में घर बनवाना नामुमकिन है। बरसात में जब छत टपकती है, तो वे अपने दोनों बच्चों के साथ एक कोने में दुबक कर रात गुजारते हैं। कड़ाके की ठंड में फटे कंबलों के सहारे बच्चों को सीने से लगाकर गर्माहट ढूंढने की कोशिश करते हैं। दर्दनाक बात यह है कि घर की पक्की छत देखने की हसरत लिए छह महीने पहले उनकी पत्नी ने भी दम तोड़ दिया।

भ्रष्टाचार और ‘सुविधा शुल्क’ का खेल

रतनपाल का आरोप है कि नगर पालिका में आवास उन्हीं को मिल रहा है जो ‘सुविधा शुल्क’ (रिश्वत) देने में सक्षम हैं। उन्होंने बताया कि कई लोग आवास दिलाने के नाम पर उनसे पैसे भी ठग ले गए, लेकिन काम कुछ नहीं हुआ।

अधिकारी का क्या है कहना?

मामले पर नगर पालिका अध्यक्ष सैयद आबिद अली का कहना है कि रतनपाल पात्रों की सूची में हैं और उनका नंबर 3185 है। उनकी फाइल जिला मुख्यालय भेजी जा चुकी है। उन्होंने आश्वासन दिया कि सरकार से बजट आते ही मकान बनवा दिया जाएगा। सवाल यह है कि क्या रतनपाल और उनके मासूम बच्चे तब तक इसी मौत के साये वाली छत के नीचे सुरक्षित रह पाएंगे?

रिपोर्ट: रंजीत बिसारिया

 

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