बलरामपुर: इंसानियत को शर्मसार करने वालों को मिली ‘उम्रकैद’, पीड़िता की हिम्मत ने जीता न्याय का संग्राम

Sandesh Wahak Digital Desk: यह कहानी केवल एक अदालती फैसले की नहीं है, बल्कि एक युवती के उस अदम्य साहस की है जिसने मौत के मुंह से लौटकर अपनी अस्मत के लुटेरों को सजा तक पहुँचाया। जनपद न्यायाधीश उत्कर्ष चतुर्वेदी ने बुधवार को वह ऐतिहासिक फैसला सुनाया, जिसने दरिंदगी करने वाले दो दोषियों को ताउम्र सलाखों के पीछे रहने का हुक्म दिया। इस घटना ने पूरे जिले को झकझोर कर रख दिया था। यह ऐतिहासिक फैसला फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट के जरिए महज 11 महीने में आया है। युवती को इस फैसले के ज़रिए ना केवल न्याय मिला है। बल्कि इस तरह का अपराध करने के बारे में सोचने वालों के लिए एक सबक भी है।

​वो खौफनाक शाम और मासूम के सपने

घटना 28 मार्च 2025 की है, जब जनपद सिद्धार्थनगर की रहने वाली एक छात्रा इंटरमीडिएट की बोर्ड परीक्षा देकर अपने सुनहरे भविष्य के सपने संजोए घर लौट रही थी। उसे क्या पता था कि रास्ते में दो ‘भेड़िए’ अजय कुमार उर्फ गौरी शंकर और धर्मेंद्र सोनी उसकी राह देख रहे हैं। खुटेहना चौराहे के पास इन दरिंदों ने उसे जबरन कार में डाल लिया।

मानवीय संवेदनाओं को झकझोरने वाली क्रूरता

दोषियों ने न केवल युवती के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया, बल्कि उनकी हैवानियत यहीं नहीं रुकी। उन्होंने हथौड़ी और प्लास से छात्रा के शरीर पर प्रहार किए और पहचान छिपाने के लिए चेहरे पर तेजाब डालकर उसे जलाने की कोशिश की। उन्हें लगा कि वह मर चुकी है, इसलिए उसे बोरे में भरकर राप्ती नदी के किनारे खेत में फेंक दिया। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। अगली सुबह बेहोशी की हालत में किसानों ने उसे देखा और पुलिस को सूचना दी।

​11 महीने का संघर्ष और न्याय की जीत

अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच झूलती उस बेटी ने हार नहीं मानी। पुलिस ने तेजी से कार्रवाई करते हुए दोनों को गिरफ्तार किया। अभियोजन पक्ष ने अदालत में कुल आठ गवाह पेश किए। मात्र 11 महीने के भीतर आए इस फैसले ने पीड़ित परिवार के आंसू तो नहीं सुखाए, लेकिन उनके जख्मों पर न्याय का मरहम जरूर लगाया है। अदालत ने दोषियों पर 4 लाख 5 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है, जिसमें से 3.50 लाख रुपये पीड़िता को दिए जाएंगे।

डीजीसी (क्रिमिनल) अधिवक्ता कुलदीप सिंह का बयान

​मामले की पैरवी कर रहे अभियोजक कुलदीप सिंह ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा, ​”यह फैसला समाज के उन तत्वों के लिए एक कड़ा संदेश है जो बेटियों की अस्मत से खिलवाड़ करते हैं। हमने अदालत के समक्ष पुख्ता सबूत और आठ गवाह पेश किए, जिससे यह साबित हुआ कि यह अपराध अत्यंत जघन्य था। महज 11 माह में दोषियों को उम्रकैद दिलाना न्यायपालिका की तत्परता और पीड़िता के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। हम यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि न्याय न केवल मिले, बल्कि समय पर मिले ताकि पीड़िता और उसका परिवार सुरक्षित महसूस कर सके।”

पुलिस अधीक्षक (SP) विकास कुमार ने इस फैसले पर कहा,  महिला अपराधों के विरुद्ध हमारी ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति का यह परिणाम है। गौरा चौराहा पुलिस द्वारा घटना के 24 घंटे के भीतर आरोपियों की गिरफ्तारी और प्रभावी पैरवी के चलते इतनी जल्दी सजा संभव हो सकी है। हम जनपद में बेटियों की सुरक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।

रिपोर्ट: योगेंद्र त्रिपाठी

 

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