SIR वैरिफिकेशन के लिए कलकत्ता HC को पड़ोसी राज्यों से जजों की नियुक्ति की इजाजत

Sandesh Wahak Digital Desk: सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में चल रहे वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया को लेकर मंगलवार को अहम फैसला सुनाया। अदालत ने न्यायिक अफसरों के पूल का दायरा बढ़ाते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को 80 लाख दावों और आपत्तियों के निपटारे के लिए सिविल जजों को तैनात करने की अनुमति दे दी। इसके साथ ही पड़ोसी राज्यों झारखंड और ओडिशा से भी न्यायिक अधिकारियों को बुलाने की इजाजत प्रदान की गई।

80 लाख मामलों की जांच में समय की चुनौती

मुख्य न्यायाधीश सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के उस पत्र पर गौर किया, जिसमें बताया गया था कि SIR प्रक्रिया के तहत तार्किक विसंगति और अवर्गीकृत श्रेणी में रखे गए वोटर्स के दस्तावेजों की जांच के लिए 294 सेवारत और सेवानिवृत्त न्यायिक जजों की तैनाती के बावजूद 80 लाख मामलों की जांच में कम से कम 80 दिन लग सकते हैं। समय की कमी और मामलों की संख्या को देखते हुए अदालत ने दायरा बढ़ाने का फैसला किया।

अनुच्छेद 142 के तहत बढ़ाया गया दायरा

गंभीर स्थिति और सीमित समय को देखते हुए बेंच ने अनुच्छेद 142 के तहत अपनी पूर्ण शक्तियों का इस्तेमाल किया और न्यायिक अधिकारियों के पूल का विस्तार करने की अनुमति दी। कोर्ट ने तीन वर्ष के अनुभव वाले न्यायिक अधिकारियों को भी तैनात करने की मंजूरी दी। साथ ही कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से कहा गया कि वे झारखंड और ओडिशा के अपने समकक्षों से संपर्क कर समान रैंक के अधिकारियों को बुलाएं। अदालत ने चुनाव आयोग को इन राज्यों से आने वाले न्यायिक अधिकारियों के खर्च वहन करने का निर्देश भी दिया।

फाइनल इलेक्टोरल रोल जारी करने की अनुमति

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को 28 फरवरी को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित करने की अनुमति दे दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि सत्यापन की प्रक्रिया आगे बढ़ने पर पूरक सूची जारी की जा सकती है। अनुच्छेद 142 के तहत शक्तियों का उपयोग करते हुए कोर्ट ने यह सुनिश्चित किया कि पात्र वोटरों को सप्लीमेंट्री इलेक्टोरल रोल में शामिल किया जा सके, ताकि वे 28 फरवरी को प्रकाशित होने वाली अंतिम सूची का हिस्सा बन सकें।

विवाद पर कोर्ट की टिप्पणी

साल 2002 की वोटर लिस्ट से जुड़ी संतानों के मामलों में तार्किक अंतरों में माता-पिता के नाम में अंतर तथा वोटर और उसके माता-पिता के बीच उम्र का अंतर 15 साल से कम या 50 साल से अधिक होना शामिल है। इससे पहले 20 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार और चुनाव आयोग के बीच जारी खींचतान पर निराशा जताते हुए SIR प्रक्रिया में मदद के लिए मौजूदा और पूर्व जिला जजों को तैनात करने का असाधारण निर्देश दिया था।

चुनाव आयोग और लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई तृणमूल कांग्रेस सरकार के बीच आरोप-प्रत्यारोप और भरोसे की कमी पर अफसोस जताते हुए सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से पूरा करने के लिए कई नए निर्देश जारी किए थे।

 

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